
लखनऊ, 2 फरवरी।
संगीत जिस शहर की रगों में बहता हो, वहां भोर भी सुरों के साथ जागती है। राजधानी लखनऊ की इसी सांगीतिक विरासत की एक मोहक झलक रविवार को कैसरबाग स्थित राजा रामपाल सिंह पार्क में आयोजित सनतकदा फेस्टिवल के विशेष कार्यक्रम ‘सहर’ में देखने को मिली। सर्द सुबह की हल्की ठिठुरन, आकाश में फैलती पौ फटने की लालिमा और परिंदों की चहचहाहट के बीच जब शास्त्रीय संगीत के स्वर गूंजे, तो पूरा वातावरण साधना और सौंदर्य में डूब गया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में संगीतप्रेमी पहुंचे और हर एक श्रोता सुरों के उस तिलिस्म का साक्षी बना, जिसने समय को थाम सा लिया।
लखनऊ केवल ईंट-पत्थरों का शहर नहीं
महफिल का शुभारंभ भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. मांडवी सिंह के उद्बोधन से हुआ। उन्होंने संगीत और लखनऊ के आत्मीय संबंधों को रेखांकित करते हुए कहा कि यह शहर केवल इमारतों का समूह नहीं, बल्कि सुरों की एक जीवित परंपरा है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही है।
इसके बाद मंच संभाला लखनऊ–शाहजहांपुर घराने के खलीफा उस्ताद इरफान मोहम्मद खान ने। उन्होंने राग भैरव की आलाप से भोर के वातावरण को स्वर दिया। सरोद से निकली उनकी हर मींड मानो सुबह की शांति को और गहरा कर रही थी।
सरोद और तबले की जुगलबंदी ने बांधा समां
उस्ताद इरफान ने भैरव की वह द्रुत बंदिश प्रस्तुत की, जो उनके परदादा शफाकत खान की रचना थी। इसके बाद महफिल राग भैरवी की ओर बढ़ी। सरोद की मधुर धुनों को लखनऊ घराने के खलीफा उस्ताद इल्मास हुसैन खान ने अपने तबले की थाप से संपूर्णता दी।
उठान, कायदा, रेला और तिहाई के माध्यम से उन्होंने अपनी उस्तादी का प्रभावशाली परिचय दिया। विशेष रूप से ‘रंग’ की प्रस्तुति ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया, जो लखनऊ घराने की विशिष्ट पहचान मानी जाती है।
बंगाली गीतों में ढली शाम
शाम का सत्र भावनाओं और आध्यात्मिकता की यात्रा बन गया, जब बोर्नो अनन्यो ने बंगाली गीतों की प्रस्तुति दी। कार्यक्रम की शुरुआत दुरबी शाह के गीत ‘नमाज अमार होइलो नाम अदाय’ से हुई, जिसमें एक साधारण इंसान और ईश्वर के बीच का सीधा, निष्कलुष संवाद उभरकर सामने आया। इस गीत ने यह संदेश दिया कि इबादत की सच्चाई बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि मन की गहराइयों में होती है।
इसके बाद चंडी दास की रचना ‘धैरयो जो नाम धुरिते’ में राधा-कृष्ण के विरह भाव को स्वर मिला। राधा द्वारा मन को धैर्य रखने का संदेश पूरे माहौल को करुणा और आत्ममंथन से भर गया।
सुरों में सजी लखनऊ की पहचान
सनतकदा फेस्टिवल का यह आयोजन एक बार फिर इस बात का प्रमाण बना कि लखनऊ की पहचान केवल तहज़ीब और नफासत तक सीमित नहीं, बल्कि संगीत, साधना और संवेदना के गहरे संस्कारों से भी जुड़ी हुई है।