नई दिल्ली: समुद्र और हवाओं के रहस्य आज भी रोमांचित करते हैं। ‘प्रचंड पचासा’ (Furious Fifties) नामक यह मौसमी घटना दक्षिणी गोलार्ध के खुल्ले महासागरों में 50° से 60° दक्षिण अक्षांशों के बीच होती है। यह बेहद तेज़ और दहाड़ती हुई पछुआ पवन (Westerlies) होती हैं, जिनकी रफ्तार इतनी अधिक होती थी कि पुराने समय के नाविक कभी-कभी अपनी नौकाएं छोड़कर समुद्र में कूद जाते थे।
प्रचंड पचासा की विशेषताएं
ये हवाएं महासागरों में पश्चिम से पूर्व की ओर बहती हैं।
दक्षिणी गोलार्ध में उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर बहने वाली ये हवाएं गरजती और बरसती हुई चलती हैं।
नाविकों ने इन्हें प्रचंड पचासा इसलिए नाम दिया, क्योंकि ये अत्यधिक शोर करती हैं और नौकायन के लिए खतरनाक होती हैं।
गति और ताकत
विशाल महासागरों में इन हवाओं की गति लगातार बढ़ती जाती है।
50° से 60° दक्षिण अक्षांशों के बीच भौगोलिक अवरोध कम होने के कारण, ये हवाएं और भी शक्तिशाली हो जाती हैं।
इनकी ताकत का लाभ मशीनीकरण से पहले यूरोप से ऑस्ट्रेलिया जाने वाली नौकाओं ने उठाया, लेकिन इन हवाओं के दौरान नौकायन जोखिम भरा माना जाता था।
उत्तरी गोलार्ध में प्रभाव
उत्तरी गोलार्ध में ये हवाएं उच्च और निम्न वायुदाब क्षेत्रों के कारण सामान्य पश्चिमी दिशा से भटक सकती हैं।
ध्रुवों की ओर इन पवनों की सीमा मौसम और अन्य परिस्थितियों के अनुसार अस्थिर रहती है।
प्रचंड पचासा और पश्चिमी विक्षोभ में अंतर
प्रचंड पचासा और पश्चिमी विक्षोभ अलग-अलग मौसमी परिघटनाएं हैं।
पश्चिमी विक्षोभ भूमध्य सागर में बनती है और भारतीय उपमहाद्वीप में सर्दी के मौसम में बारिश लाती है।
वहीं, प्रचंड पचासा केवल दक्षिणी गोलार्ध में चलने वाली ताकतवर पछुआ हवाएं हैं।
नाविकों के लिए खतरा
प्रचंड पचासा की दहाड़ इतनी भयंकर होती थी कि नौकायन के पुराने दस्तावेज़ों में इसे लेकर कई किस्से दर्ज हैं।
ये हवाएं और महासागर की लहरें मिलकर पुराने समय में समुद्र यात्रियों के लिए जीवन और जहाज दोनों के लिए खतरा पैदा करती थीं।