
नई दिल्ली।
मेडिकल साइंस के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि दर्ज करते हुए दिल्ली के डॉ. राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल में देश की पहली ‘नी-सैल्वेज’ सर्जरी सफलतापूर्वक की गई है। इस अनोखी सर्जरी के जरिए 30 वर्षीय महिला को गंभीर घुटने के दर्द से राहत मिली है और कम उम्र में घुटना ट्रांसप्लांट कराने की नौबत टल गई है।
महिला लंबे समय से घुटने में असहनीय दर्द से पीड़ित थी। जांच में पता चला कि उसके घुटने का मेनिस्कस पूरी तरह फट चुका था। पहले मेनिस्कस रिपेयर की सर्जरी की गई, लेकिन खून की कम सप्लाई के कारण घाव ठीक नहीं हो सका और सर्जरी असफल रही। इसके बाद आखिरी विकल्प के रूप में डॉक्टरों ने ‘नी-सैल्वेज’ तकनीक अपनाने का फैसला किया।
जांघ के टिशू से तैयार किया नया कुशन
इस अत्याधुनिक सर्जरी में मरीज की जांघ (फीमर) के टिशू से नया कुशन तैयार कर उसे मेनिस्कस की जगह प्रत्यारोपित किया गया। यह कुशन घुटने की हड्डियों के बीच घर्षण को रोकता है और दर्द से राहत देता है। सर्जरी के बाद मरीज की हालत में तेजी से सुधार हुआ है और भविष्य में अर्थराइटिस का खतरा भी काफी हद तक कम हो गया है।
डेढ़ घंटे में पूरी हुई जटिल सर्जरी
13 जनवरी को ऑर्थोपेडिक विभाग के प्रमुख डॉ. राहुल खरे के नेतृत्व में यह सर्जरी की गई। उनकी टीम में डॉ. प्रणय गुप्ता, डॉ. रवि रंजन और डॉ. मोहित राज शामिल रहे। पूरी सर्जरी करीब डेढ़ घंटे में सफलतापूर्वक पूरी की गई।
क्यों खास है यह तकनीक
डॉ. राहुल खरे ने बताया कि घुटने में मौजूद दो मेनिस्कस हड्डियों के बीच कुशन का काम करते हैं, लेकिन इनमें खून की सप्लाई बहुत कम होती है। करीब दो-तिहाई हिस्से में रक्त प्रवाह न होने के कारण रिपेयर के बाद भी कई बार हीलिंग नहीं हो पाती। पहले ऐसे मामलों में मेनिस्कस निकाल दिया जाता था, जिससे कुछ ही वर्षों में अर्थराइटिस हो जाता था और बार-बार घुटना बदलने की जरूरत पड़ती थी।
देश के लिए नई उम्मीद
मेडिकल डायरेक्टर डॉ. अशोक कुमार और मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. विवेक दीवान के सहयोग से यह उपलब्धि संभव हो सकी। डॉक्टरों का कहना है कि यह तकनीक कम उम्र के मरीजों के लिए घुटना ट्रांसप्लांट का बेहतर विकल्प साबित हो सकती है और भविष्य में हजारों मरीजों को लाभ पहुंचाएगी।