
नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को चुनाव आयोग से कहा कि विशेष गहन संशोधन (SIR) से जुड़े आदेश में यह साफ़ तौर पर नहीं लिखा गया था कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य अवैध प्रवासियों की पहचान करना भी है। चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने अदालत की इस टिप्पणी को स्वीकार करते हुए कहा कि आदेश में इसका कोई प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं था।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमलया बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि एसआईआर आदेश में नागरिकता के सत्यापन को इस अभियान का लक्ष्य बताकर दर्ज नहीं किया गया था। पीठ ने कहा कि यदि किसी प्रक्रिया का असर नागरिक अधिकारों पर पड़ता है, तो उसका उल्लेख और उद्देश्य दोनों स्पष्ट होने चाहिए।
चुनाव आयोग ने प्रक्रिया को बताया निष्पक्ष और पारदर्शी
चुनाव आयोग की ओर से दलील रखते हुए राकेश द्विवेदी ने कहा कि मतदाता सूची का विशेष संशोधन पूरी तरह निष्पक्ष, न्यायपूर्ण और पारदर्शी था। उन्होंने इस प्रक्रिया को मनमाना बताए जाने के आरोपों को खारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं की मंशा पर सवाल उठाए।
उन्होंने बताया कि बिहार में इस अभियान के दौरान 66 लाख नाम हटाए गए, लेकिन इनमें से किसी भी व्यक्ति ने न तो सुप्रीम कोर्ट, न ही हाई कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई और न ही चुनाव आयोग के समक्ष कोई आपत्ति दी। उन्होंने कहा कि एडीआर, पीयूसीएल और कुछ सांसदों के आग्रह मात्र पर, बिना ठोस साक्ष्यों के, व्यापक जांच की अनुमति नहीं दी जा सकती।
अमेरिकी ‘ड्यू प्रोसेस’ का हवाला अनुचित
याचिकाकर्ताओं द्वारा अमेरिकी कानून के ‘ड्यू प्रोसेस’ का हवाला दिए जाने पर चुनाव आयोग ने कड़ा रुख अपनाया। आयोग ने कहा कि अमेरिकी अवधारणाओं को भारतीय संविधान पर लागू नहीं किया जा सकता। उदाहरण देते हुए आयोग ने कहा कि अमेरिका खुद कई मामलों में अपने घोषित सिद्धांतों का पालन नहीं करता, ऐसे में वहां की न्यायिक मिसालों को भारत में लागू करना उचित नहीं है।
सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन
पारदर्शिता पर जोर देते हुए चुनाव आयोग ने बताया कि बूथ लेवल एजेंटों ने घर-घर जाकर सत्यापन किया और मतदाताओं को पांच करोड़ से अधिक एसएमएस अलर्ट भेजे गए। आयोग के अनुसार, पूरी प्रक्रिया में सभी सुरक्षा और कानूनी नियमों का सख्ती से पालन किया गया।
कोर्ट की पहले की टिप्पणी
गौरतलब है कि बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची के संशोधन के लिए असीमित शक्तियां नहीं हो सकतीं। यह प्रक्रिया स्पष्ट दिशा-निर्देशों, पारदर्शिता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत ही होनी चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि मतदाता सूची से नाम हटने का असर लोगों के नागरिक अधिकारों पर गंभीर रूप से पड़ सकता है और ऐसी स्थिति में यह प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 के अनुरूप ही होनी चाहिए।