
वॉशिंगटन/नई दिल्ली: आर्कटिक में पिघलती बर्फ ने दुनिया के भू-राजनीतिक नक्शे को बदलने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस क्षेत्र में बनने वाले नए समुद्री रास्ते—विशेषकर ग्रीनलैंड के पास—भविष्य की ग्लोबल सप्लाई चेन और शक्ति संतुलन पर गहरा असर डाल सकते हैं। इसी कारण अमेरिका, चीन और रूस ग्रीनलैंड और इसके आसपास के क्षेत्रों पर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुट गए हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण की महत्वाकांक्षा रखते हैं। उनका मकसद केवल रणनीतिक रूप से पश्चिमी गोलार्ध को सुरक्षित करना ही नहीं, बल्कि चीन और रूस को आर्कटिक में बढ़ते प्रभाव से रोकना भी है। अमेरिकी योजना के तहत तकनीकी श्रेष्ठता, वित्तीय लाभ और सुरक्षा आधारित व्यापार को मजबूती देना प्राथमिक लक्ष्य है।
आर्कटिक कॉरिडोर: नया ग्लोबल हब
ग्रीनलैंड से होकर गुजरने वाले दो प्रमुख मार्ग इस क्षेत्र की महत्वाकांक्षा को स्पष्ट करते हैं।
- नॉर्थवेस्ट पैसेज (NWP): यह कनाडाई आर्कटिक क्षेत्र से होकर गुजरता है और ग्रीनलैंड के पश्चिमी तट के पास निकलता है। इस मार्ग से माल ढुलाई में समय और दूरी दोनों की बचत होगी।
- ट्रांसपोलर रूट: भविष्य में बर्फ पिघलने के बाद यह मार्ग सीधे उत्तरी ध्रुव के ऊपर से गुजर सकेगा, जिससे यूरोप और पूर्वी एशिया के बीच व्यापारिक कनेक्टिविटी मजबूत होगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे-जैसे बर्फ पिघलेगी, ग्रीनलैंड ग्लोबल ट्रेड और पावर का एक केंद्रीय हब बन जाएगा।
अमेरिका, रूस और चीन की दावेदारी
- अमेरिका: उत्तरी अमेरिकी महाद्वीप का हिस्सा होने के नाते ग्रीनलैंड में पिटुफिक स्पेस बेस और एर्ली-वॉर्निंग रडार सिस्टम है। यह रूस की न्यूक्लियर मिसाइलों की निगरानी और GIUK गैप के नियंत्रण के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
- रूस: सोवियत युग के 50 से अधिक आर्कटिक बेसों को फिर से सक्रिय कर रूस इस क्षेत्र पर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है। रूस के पास न्यूक्लियर-पावर्ड आइसब्रेकर बेड़े के जरिए ये क्षेत्र नियंत्रित करने की क्षमता है।
- चीन: आर्कटिक का कोई क्षेत्र तो नहीं है, लेकिन उसने खुद को “आर्कटिक के पास का देश” घोषित कर दिया है। चीन ग्रीनलैंड में बंदरगाहों और खनिज परियोजनाओं में निवेश कर अपने ‘पोलर सिल्क रोड’ नेटवर्क का विस्तार कर रहा है।
ग्रीनलैंड में पाए जाने वाले रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REEs) इलेक्ट्रिक वाहनों और मिसाइल टेक्नोलॉजी के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। अमेरिका और चीन दोनों इस संसाधन पर अपने प्रभाव को मजबूत करने के लिए रणनीतिक निवेश कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह संघर्ष सिर्फ क्षेत्रीय नहीं बल्कि एक नए वैश्विक टकराव—‘कोल्ड वार 2.0’—की शुरुआत है। जिस देश के हाथ में इन समुद्री कॉरिडोरों का नियंत्रण होगा, वही भविष्य की वैश्विक सप्लाई चेन और शक्ति संतुलन को नियंत्रित करेगा।