Tuesday, January 13

राजस्थान: 25,000 करोड़ रुपये के उम्मेद भवन पैलेस में रहते हैं ‘बापजी’, 78वें जन्मदिन पर जानिए महाराजा गजसिंह द्वितीय की कहानी

 

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मारवाड़ के पूर्व नरेश और शाही परिवार के मुखिया महाराजा गजसिंह द्वितीय आज अपना 78वां जन्मदिन मना रहे हैं। लगभग 25,000 करोड़ रुपये मूल्य के ऐतिहासिक उम्मेद भवन पैलेस में रहने वाले गजसिंह द्वितीय, जिन्हें लोग प्यार से ‘बापजी’ कहते हैं, मारवाड़ की शाही परंपरा के संवाहक और आधुनिक दौर में राजपरिवार को नई दिशा देने वाले व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं।

 

चार साल की उम्र में संभाली गद्दी

महाराजा गजसिंह द्वितीय का जीवन बचपन से ही चुनौतियों से भरा रहा। वर्ष 1952 में विमान हादसे में उनके पिता महाराजा हनवंत सिंह और उनकी दूसरी पत्नी का निधन हो गया। उस समय गजसिंह महज चार वर्ष के थे और उन्हें मारवाड़ की गद्दी संभालनी पड़ी।

 

ईटन और ऑक्सफोर्ड से हासिल की शिक्षा

प्रारंभिक शिक्षा भारत में प्राप्त करने के बाद गजसिंह द्वितीय ने इंग्लैंड के प्रतिष्ठित ईटन कॉलेज और फिर ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा हासिल की। 1970 में भारत लौटने के बाद उन्होंने पारिवारिक विरासत संभाली और परंपरा व आधुनिकता के बीच संतुलन बनाए रखा।

 

उम्मेद भवन पैलेस: विरासत का संरक्षण और वैश्विक पहचान

उम्मेद भवन पैलेस गजसिंह द्वितीय के जीवन में विशेष महत्व रखता है। इस महल को उन्होंने संरक्षित रखा और ताज ग्रुप के सहयोग से इसे विश्वस्तरीय लग्जरी होटल के रूप में विकसित किया। आज यह महल शाही निवास, संग्रहालय और होटल तीनों रूपों में प्रसिद्ध है।

 

परिवार: पत्नी और संतानें

महाराजा गजसिंह द्वितीय का विवाह पूंछ के राजा की पुत्री हेमलता राजे से हुआ। उनके दो संतानें हैं – बेटी शिवरंजनी राजे और पुत्र शिवराज सिंह, जो मारवाड़ के युवराज हैं। शिवराज सिंह अंतरराष्ट्रीय पोलो खिलाड़ी के रूप में भी जाने जाते हैं।

 

साहस और संघर्ष की कहानी

शिवराज सिंह पोलो में +3 हैंडीकैप के साथ भारत के शीर्ष खिलाड़ियों में शामिल रहे। 18 फरवरी 2005 को जयपुर में हुए पोलो मैच में गंभीर ब्रेन हेमरेज हुआ। लंबे समय तक कोमा में रहने के बाद भी वे अपने साहस और जिजीविषा से संघर्ष कर रहे हैं।

 

जन्मदिन पर शुभकामनाएं

78वें जन्मदिन के अवसर पर महाराजा गजसिंह द्वितीय को देश-विदेश से शुभकामनाएं मिल रही हैं। शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक सरोकारों को प्राथमिकता देने वाले ‘बापजी’ आज भी जोधपुर और मारवाड़ की पहचान बने हुए हैं।

 

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