Tuesday, January 13

‘हमदर्दी कानून से ऊपर नहीं’ : सुप्रीम कोर्ट ने पलटा सरकारी नौकरी पर हाईकोर्ट का आदेश

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरी में आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाने वाले युवक को राहत देने से मना कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सहानुभूति कानून किसी भी तरह से नियम और कानून की जगह नहीं ले सकता। युवक को अपनी सरकारी नौकरी गंवानी पड़ेगी, क्योंकि उसने भर्ती के समय अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाई थी।

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सुप्रीम कोर्ट का आदेश

जस्टिस संजय करोल और एन.के. सिंह की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा, “कानून भले ही कठोर हो, लेकिन कानून तो कानून है।” अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया जिसमें कहा गया था कि जानकारी छिपाना मामूली बात है और इस आधार पर नियुक्ति रद्द नहीं की जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारी नौकरी पाने के लिए आवेदन में पूरी और सही जानकारी देना केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि निष्पक्षता, ईमानदारी और जनता के भरोसे की बुनियादी जरूरत है।

 

जानकारी छिपाने का गंभीर प्रभाव

अदालत ने बताया कि जब कोई उम्मीदवार अपने आपराधिक इतिहास की जानकारी छिपाता है, तो यह चयन प्रक्रिया को कमजोर करता है। इससे नियुक्ति करने वाले अधिकारी को उम्मीदवार की उपयुक्तता का सही आकलन करने का मौका नहीं मिलता।

कानून यह मानता है कि अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों के आधार पर जानकारी न देना हमेशा नौकरी के लिए घातक नहीं हो सकता। लेकिन जानबूझकर जानकारी छिपाना गंभीर धोखाधड़ी मानी जाती है और सरकारी सेवा में भरोसे को ठेस पहुंचाती है।

 

मामले की पृष्ठभूमि

इस मामले में युवक को सहायक समीक्षा अधिकारी के पद पर नियुक्त किया गया था। बाद में यह पता चला कि उसके खिलाफ दो आपराधिक मामले लंबित थे, जिन्हें उसने आवेदन में नहीं बताया। सेवाएं समाप्त होने के बाद उसने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट की एकल और खंडपीठ दोनों ने उसकी बर्खास्तगी रद्द कर दी। इसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और उच्चतम न्यायालय ने सरकारी नियमों को मानते हुए हाईकोर्ट का आदेश पलट दिया।

 

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