
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ग्रीनलैंड को अपने नियंत्रण में लेने की इच्छा जताई है, जिससे न केवल डेनमार्क बल्कि पूरे यूरोप में चिंता बढ़ गई है। यह विवाद NATO के भीतर पहले कभी नहीं देखी गई परिस्थितियों को जन्म दे रहा है, क्योंकि डेनमार्क और अमेरिका दोनों ही इस गठबंधन के सदस्य हैं।
ट्रंप का रुख और यूरोप की चिंता
सीएनएन के अनुसार, ट्रंप ग्रीनलैंड पर अपने अधिकार के लिए पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। इस संबंध में डेनमार्क के ऑटोनॉमस हिस्से पर अमेरिकी कब्जे की धमकी ने NATO को गंभीर चुनौती में डाल दिया है। NATO का सिद्धांत है कि किसी एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा, और अब यह संकट पैदा हुआ है कि एक सदस्य (अमेरिका) दूसरे सदस्य (डेनमार्क) पर दबाव डाल सकता है।
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्न ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका उनके देश पर हमला करता है तो NATO की स्थिरता खतरे में पड़ जाएगी। यूरोपीय नेताओं में ट्रंप के रुख को लेकर गहरी बेचैनी है, लेकिन रूस के साथ टकराव को देखते हुए वे अमेरिका को नाराज करने से बच रहे हैं।
यूरोप का विकल्प और रणनीति
पेरिस में 35 देशों के प्रतिनिधियों की बैठक में यूरोप ने इस मुद्दे पर चर्चा की कि यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के साथ शांति समझौते के तहत सुरक्षा की गारंटी कैसे दी जाए। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस विवाद पर टालमटोल करते हुए डेनमार्क के साथ एकजुटता दिखाई।
पॉलिटिकल रिस्क कंसल्टेंसी यूरेशिया ग्रुप के यूरोप डायरेक्टर मुजतबा रहमान के अनुसार, यूरोप अमेरिका के खिलाफ सख्त रुख अपनाना चाहता है, लेकिन वर्तमान में उनके पास कोई व्यवहारिक विकल्प नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोप सैन्य हार्डवेयर और सुरक्षा मामलों में अमेरिका पर अत्यधिक निर्भर है, और ट्रंप की नाराजगी से डरता है।
ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत
करीब 57,000 की आबादी वाला ग्रीनलैंड स्वशासित है और इसकी रक्षा एवं विदेश नीति डेनमार्क के अधीन है। यह द्वीप रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है और अक्सर अमेरिका के नियंत्रण के खिलाफ गुस्सा देखा गया है। यूरोप इस द्वीप को सुरक्षित रखने और NATO की स्थिरता बनाए रखने के विकल्प तलाश रहा है।
इस विवाद ने स्पष्ट कर दिया है कि ग्रीनलैंड का मुद्दा न केवल अमेरिका और डेनमार्क बल्कि पूरे यूरोपीय सुरक्षा तंत्र के लिए चुनौतीपूर्ण बन गया है, और NATO के अंदर असंतोष और बेचैनी को उजागर कर रहा है।