
केरल सरकार ने कर्नाटक से सटे सीमावर्ती इलाकों के स्कूलों में मलयालम को पहली अनिवार्य भाषा बनाने का प्रस्ताव दिया है। इस कदम का कर्नाटक में जोरदार विरोध हो रहा है।
सिद्धारमैया का विरोध
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इसे भाषाई अल्पसंख्यकों पर थोपी गई भाषा करार दिया। उन्होंने कहा कि यह छात्रों की पढ़ाई में बाधा डालने वाला और उनके आत्मविश्वास को कम करने वाला फैसला है। उन्होंने केरल सरकार से इस ‘जबरदस्ती वाले रवैये’ को वापस लेने की मांग की। सिद्धारमैया ने कहा कि कर्नाटक भी कन्नड़ के लिए ऐसा ही करता है, लेकिन इसे छात्रों पर थोपना गलत है।
कर्नाटक सीमा क्षेत्र विकास प्राधिकरण की आपत्ति
कर्नाटक सीमा क्षेत्र विकास प्राधिकरण ने भी इस बिल पर विरोध जताया है। प्राधिकरण का कहना है कि मलयालम को अनिवार्य पहली भाषा बनाने से सीमावर्ती इलाकों के कन्नड़ भाषी छात्रों की शिक्षा प्रभावित होगी। कासरगोड जिले में छात्र पारंपरिक रूप से कन्नड़ को पहली भाषा के रूप में पढ़ते हैं। प्राधिकरण ने बिल को असंवैधानिक बताया और भारतीय संविधान के तहत अल्पसंख्यकों के भाषाई अधिकारों का उल्लंघन करार दिया।
शैक्षणिक और सांस्कृतिक चिंताएं
प्राधिकरण ने चेतावनी दी है कि यह फैसला छात्रों के शिक्षा विकल्पों पर असर डालेगा, खासकर उच्च शिक्षा के लिए केरल के बाहर जाने पर। उन्होंने 2017 में इसी तरह के मलयालम बिल को राष्ट्रपति द्वारा खारिज किए जाने का उदाहरण भी दिया।
अन्य मांगें
ज्ञापन में कासरगोड जिले में कन्नड़ माध्यम स्कूलों में अनिवार्य रूप से कन्नड़ शिक्षकों की नियुक्ति, सरकारी दफ्तरों और परिवहन अड्डों पर कन्नड़ साइनबोर्ड, और आधिकारिक पत्राचार में कन्नड़ के प्रयोग की मांग भी की गई।
केरल के राज्यपाल ने आश्वासन दिया है कि भाषाई अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए बिल की समीक्षा की जाएगी। कर्नाटक सीमा क्षेत्र विकास प्राधिकरण ने स्पष्ट किया है कि वह सीमावर्ती कन्नड़ लोगों की भाषा, संस्कृति और शैक्षणिक अधिकारों की रक्षा के लिए मामले को आगे बढ़ाता रहेगा।