
सोशल मीडिया और आध्यात्मिक प्रवचनों के माध्यम से देशभर में प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज के आश्रम में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपनी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए पहुंचते हैं। हाल ही में एक श्रद्धालु द्वारा पूछे गए प्रश्न ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। श्रद्धालु ने जानना चाहा कि प्राचीन युगों में देवताओं और यहां तक कि कंस जैसे राक्षसों के लिए भी आकाशवाणी होती थी, लेकिन कलियुग में अब ऐसा क्यों नहीं होता?
इस प्रश्न पर प्रेमानंद महाराज ने स्पष्ट और विचारोत्तेजक उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि यह युग धर्म का प्रभाव है। कलियुग में पवित्रता और तपस्या का स्तर अत्यंत गिर गया है। प्राचीन काल में राक्षस भी हजारों-हजारों वर्षों तक घोर तपस्या करते थे। हिरण्यकश्यप जैसे असुरों ने ऐसी तपस्या की कि शरीर गलकर केवल हड्डियों का ढांचा रह गया। उनकी तपस्या से तीनों लोक विचलित हो उठते थे। ब्रह्मा जी स्वयं प्रकट होकर वरदान देते थे, और तभी आकाशवाणी जैसी दिव्य घटनाएं घटित होती थीं।
प्रेमानंद महाराज ने कहा कि पहले का वातावरण अत्यंत पवित्र था। उस समय राक्षस भी नियम, संयम और तपस्या का पालन करते थे। आज के समय में स्थिति बिल्कुल विपरीत है। अधिकांश लोग संध्या-वंदन नहीं करते, पूजा-पाठ से दूर हो गए हैं। समाज में शराब सेवन और मांसाहार जैसी प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं। यही कारण है कि दिव्यता का अनुभव अब दुर्लभ हो गया है।
उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि कलियुग का प्रभाव इतना गहरा है कि आज तपस्वी कुल में जन्म लेने वाले लोग भी राक्षसी आचरण करने लगे हैं। युग बदलने के साथ धर्म का स्वरूप भी बदल जाता है और उसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ता है।
कलियुग में नाम जप ही सबसे सरल मार्ग
श्रद्धालुओं की जिज्ञासा को शांत करते हुए प्रेमानंद महाराज ने कहा कि कलियुग में कठोर तपस्या, कठिन योग और विस्तृत शास्त्र अध्ययन हर किसी के लिए संभव नहीं है। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है—
“कलियुग केवल नाम अधारा, सुमिर-सुमिर नर उतरहिं पारा।”
उन्होंने कहा कि कलियुग में केवल भगवान के नाम का जप ही सबसे सरल, सुलभ और प्रभावी साधन है। बिना किसी कठिन साधना के, केवल सच्चे मन से नाम स्मरण करने से ही मनुष्य का कल्याण संभव है।
प्रेमानंद महाराज के इस प्रवचन ने श्रद्धालुओं को न केवल उनके प्रश्न का उत्तर दिया, बल्कि कलियुग में आध्यात्मिक जीवन का मार्ग भी स्पष्ट कर दिया।