Tuesday, December 30

भारत की वैश्विक छवि बनाम पासपोर्ट की हकीकत: श्रीधर वेम्बु–विजय बहस ने उठाए बड़े सवाल

 

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नई दिल्ली — भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि में आए बदलाव और भारतीय पासपोर्ट की कमजोर स्थिति को लेकर जोहो के संस्थापक श्रीधर वेम्बु और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व ट्विटर) के एक यूजर विजय के बीच तीखी बहस छिड़ गई। यह बहस जल्द ही केवल एक ऑनलाइन तकरार न रहकर, भारत की कूटनीति, आर्थिक ताकत और आम नागरिकों की वैश्विक पहुंच जैसे अहम मुद्दों पर गंभीर चर्चा में बदल गई।

 

श्रीधर वेम्बु ने अपने पोस्ट में कहा कि पिछले दस वर्षों में विदेशों में भारत की छवि में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। उन्होंने इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को देते हुए कहा कि जो लोग लंबे समय तक विदेश में रहे हैं, वे इस बदलाव को साफ तौर पर महसूस कर सकते हैं। वेम्बु के मुताबिक, यही वजह है कि प्रवासी भारतीयों के बीच प्रधानमंत्री की लोकप्रियता लगातार बनी हुई है।

 

हालांकि, विजय ने इस दावे पर सीधा सवाल खड़ा किया। उन्होंने पूछा कि अगर भारत की छवि वाकई इतनी बेहतर हुई है, तो फिर भारतीय पासपोर्ट अब भी दुनिया के कमजोर पासपोर्ट्स में क्यों गिना जाता है? उनका तर्क था कि किसी देश की वास्तविक वैश्विक स्वीकार्यता का पैमाना यह है कि दूसरे देश उसके नागरिकों पर कितना भरोसा करते हैं और उन्हें बिना वीजा या वीजा ऑन अराइवल कितनी आसानी से प्रवेश देते हैं।

 

इस पर वेम्बु ने जवाब देते हुए कहा कि पासपोर्ट की ताकत सीधे तौर पर जीडीपी प्रति व्यक्ति (GDP per Capita) से जुड़ी होती है। भारत की आबादी बहुत बड़ी है और प्रति व्यक्ति आय अभी भी कम है। ऐसे में पासपोर्ट की वैश्विक साख बढ़ने में समय लगेगा। उन्होंने यह भी कहा कि जीडीपी प्रति व्यक्ति को कई गुना बढ़ाना दशकों का काम है, लेकिन भविष्य में भारतीय पासपोर्ट मजबूत होगा, इस पर उन्हें पूरा भरोसा है।

 

विजय ने इस तर्क का खंडन करते हुए कहा कि आर्थिक स्थिति जरूर एक कारक है, लेकिन यही अकेला कारण नहीं हो सकता। उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का उदाहरण देते हुए कहा कि आक्रामक और रणनीतिक कूटनीति के दम पर यूएई ने महज एक दशक में अपने पासपोर्ट को 42वें स्थान से आठवें स्थान तक पहुंचा दिया। इसके अलावा उन्होंने मलेशिया और चिली जैसे देशों का भी जिक्र किया, जिनकी आर्थिक ताकत भारत से बहुत अधिक नहीं है, फिर भी उनके पासपोर्ट कहीं ज्यादा मजबूत हैं।

 

विजय का कहना था कि कम जीडीपी प्रति व्यक्ति एक चुनौती जरूर है, लेकिन इसे पासपोर्ट मोबिलिटी में ठहराव का बहाना नहीं बनाया जा सकता। अगर भारत की छवि वास्तव में बदली है, तो इसका असर आज दिखना चाहिए, न कि 2050 का इंतजार करना पड़े।

 

हेनले पासपोर्ट इंडेक्स के मुताबिक, मलेशिया का पासपोर्ट दुनिया में 12वें स्थान पर है और उसके नागरिक 180 देशों में बिना पूर्व-अनुमोदित वीजा यात्रा कर सकते हैं। चिली 14वें स्थान पर है, जबकि भारत 81वें स्थान पर बना हुआ है और भारतीय नागरिकों को केवल 57 देशों में ही वीजा-फ्री या वीजा ऑन अराइवल की सुविधा मिलती है।

 

यह बहस केवल दो व्यक्तियों के विचारों की टकराहट नहीं है, बल्कि यह सवाल खड़ा करती है कि क्या भारत की वैश्विक छवि में सुधार का लाभ आम भारतीय नागरिक तक पहुंच रहा है? और क्या मजबूत कूटनीति के जरिए पासपोर्ट की ताकत बढ़ाने की दिशा में अभी और प्रयासों की जरूरत है?

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