
नई दिल्ली: भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला देश है, लेकिन विकसित और आत्मनिर्भर भारत बनने के लिए ऊर्जा का पर्याप्त और भरोसेमंद स्रोत बेहद जरूरी है। औद्योगिक विकास और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए ऊर्जा की बढ़ती मांग के बीच जलवायु परिवर्तन की चुनौती भी सामने है। ऐसे में परमाणु ऊर्जा एक भरोसेमंद और स्थायी विकल्प के रूप में उभर रही है।
परमाणु ऊर्जा क्यों जरूरी है:
विश्व स्तर पर कार्बन उत्सर्जन कम करने के प्रयासों में रिन्यूएबल ऊर्जा जैसे सौर और पवन ऊर्जा का निवेश बढ़ रहा है। हालांकि इन स्रोतों की सबसे बड़ी समस्या अनियमितता है। वहीं, परमाणु ऊर्जा लगातार, बड़े पैमाने पर और कम कार्बन उत्सर्जन के साथ बिजली उत्पादन कर सकती है। उदाहरण के लिए, यूरेनियम-235 की एक छोटी मात्रा कई हजार टन कोयले के बराबर ऊर्जा देती है। यह कम जमीन में, लंबे समय तक और अनुमानित लागत पर काम करती है।
भारत का परमाणु कार्यक्रम:
1950 के दशक में डॉ. होमी जे. भाभा ने देश की ऊर्जा स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए परमाणु कार्यक्रम शुरू किया। इसका उद्देश्य तीन चरणों में ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना था –
- प्राकृतिक यूरेनियम से चलने वाले दाब युक्त भारी जल रिएक्टर।
- फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (प्रोटोटाइप कलपक्कम, तमिलनाडु)।
- थोरियम आधारित प्रणाली, जिसमें भारत के पास प्रचुर भंडार है।
वर्तमान में भारत में 25 परमाणु रिएक्टर काम कर रहे हैं, जिनकी कुल क्षमता 8,780 मेगावाट है। परमाणु विज्ञान ने न केवल बिजली उत्पादन बल्कि चिकित्सा, कृषि और उद्योग में भी परिवर्तनकारी भूमिका निभाई है।
सरकारी पहल और लक्ष्य:
सरकार ने परमाणु ऊर्जा को राष्ट्रीय योजना में केंद्रित किया है। परमाणु ऊर्जा मिशन की शुरुआत की गई है और साल 2047 तक 100 गीगावाट क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टरों के लिए 20 हजार करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। कानून में संशोधन के प्रस्ताव से निजी क्षेत्र की भागीदारी भी बढ़ेगी।
चुनौतियां:
हालांकि नीतिगत पहल तेज हैं, लेकिन लक्ष्य तक पहुंचने के लिए पर्याप्त निवेश, स्किल्ड फोर्स और लोगों की सकारात्मक सोच जरूरी है। सबसे बड़ी चुनौती परमाणु ऊर्जा के प्रति सामाजिक और राजनीतिक संदेह है। इसके बावजूद, विशेषज्ञों का मानना है कि यह कोयला, तेल और अन्य स्रोतों की तुलना में सुरक्षित, स्थायी और भविष्य की ऊर्जा जरूरतों के लिए अनिवार्य है।