
बीजिंग/वॉशिंगटन: जून 2020 में भारत के साथ गलवान घाटी संघर्ष के केवल सात दिन बाद चीन ने गुप्त रूप से एक यील्ड-प्रोड्यूसिंग न्यूक्लियर टेस्ट किया। अमेरिकी अधिकारियों ने यह आरोप लगाया है कि यह परीक्षण कॉम्प्रिहेंसिव न्यूक्लियर-टेस्ट-बैन ट्रीटी (CTBT) के प्रतिबंधों का उल्लंघन करता है।
अमेरिकी विदेश उप सचिव थॉमस डिनानो ने जिनेवा में एक अंतरराष्ट्रीय निरस्त्रीकरण सम्मेलन में कहा, “चीन ने अपने परमाणु परीक्षणों को छिपाने की कोशिश की। PLA ने यील्ड-प्रोड्यूसिंग टेस्ट किया, जिसमें भूकंपीय निगरानी को धोखा देने के लिए ‘डीकपलिंग’ तकनीक का इस्तेमाल हुआ।”
यील्ड-प्रोड्यूसिंग टेस्ट क्या होता है?
इस तरह के टेस्ट में परमाणु सामग्री का इस्तेमाल तो होता है, लेकिन इसे इस तरह डिजाइन किया जाता है कि कोई पूर्ण परमाणु विस्फोट न हो। यानी मशरूम जैसी आग का गोला नहीं बनता। इसे ‘ज़ीरो यील्ड टेस्ट’ कहा जाता है। इसका उद्देश्य यह जांचना होता है कि हथियार डिजाइन के अनुसार काम कर रहा है या नहीं। ऐसे हथियार आकार में छोटे होते हैं, लेकिन क्षमता में पुराने परमाणु हथियारों से सैकड़ों गुना अधिक ताकतवर होते हैं।
अमेरिका का रुख और चिंता
अमेरिका का कहना है कि चीन का यह परीक्षण अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन है। अमेरिकी रिपोर्टों के मुताबिक चीन ने लो-प नूर न्यूक्लियर टेस्ट साइट पर बड़े पैमाने पर खुदाई और उपकरण की तैनाती की, जिससे न्यूक्लियर टेस्टिंग गतिविधियों की पारदर्शिता कम हुई। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ‘ज़ीरो यील्ड’ स्टैंडर्ड का पालन करते हैं, और चीन की गतिविधियों को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है।
चीन का जवाब
चीन के राजदूत शेन जियान ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा, “अमेरिका तथाकथित चीन न्यूक्लियर खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है। हथियारों की होड़ को बढ़ाने के लिए वही जिम्मेदार है।”
चीन के परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ रहा
पेंटागन की रिपोर्टों के अनुसार, चीन ने हालिया सैन्य परेड में कई नई इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें और हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल प्रदर्शित की हैं, जिनसे अमेरिका तक परमाणु हमला किया जा सकता है। वर्तमान में चीन के पास लगभग 600 वॉरहेड्स हैं, जिनकी संख्या 2030 तक 1,000 और 2035 तक 1,500 तक पहुंचने का अनुमान है।
अमेरिका का कहना है कि इस तरह के परीक्षण चीन की बढ़ती परमाणु क्षमता और रणनीतिक महत्वाकांक्षा को दर्शाते हैं।