
नई दिल्ली:
भारत की आज़ादी की लड़ाई में जिन नामों ने साहस, त्याग और नेतृत्व की नई परिभाषा गढ़ी, उनमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। देश के प्रति उनका समर्पण इतना प्रबल था कि उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की सबसे प्रतिष्ठित नौकरी इंडियन सिविल सर्विस (ICS) तक को ठुकरा दिया। उनके इसी अदम्य साहस और निस्वार्थ देशसेवा को सम्मान देने के लिए हर साल 23 जनवरी को, उनकी जयंती के अवसर पर, पराक्रम दिवस मनाया जाता है।
ओडिशा से इंग्लैंड तक शिक्षा का सफर
सरकारी दस्तावेजों और सांस्कृतिक मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार, सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को ओडिशा के कटक में हुआ था। शुरुआती शिक्षा के बाद उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा प्राप्त की। आगे चलकर वे भारतीय सिविल सेवा (ICS) की तैयारी के लिए इंग्लैंड गए, जो उस दौर में भारतीय युवाओं का सबसे बड़ा सपना माना जाता था।
ICS परीक्षा में चौथा स्थान, फिर भी छोड़ी नौकरी
नेताजी ने 1919–20 में ICS परीक्षा पास कर चौथा स्थान हासिल किया। इस उपलब्धि के साथ वे ब्रिटिश शासन के उच्च अधिकारी बन सकते थे। लेकिन देश को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त देखने का उनका संकल्प इससे कहीं बड़ा था। उन्होंने इस प्रतिष्ठित नौकरी को यह कहकर ठुकरा दिया कि
“मैं गुलाम भारत की सेवा नहीं कर सकता।”
कांग्रेस से टकराव और स्वतंत्र रास्ते का चुनाव
नौकरी छोड़ने के बाद सुभाष चंद्र बोस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) से जुड़े। वे अपने तेजस्वी विचारों और पूर्ण स्वतंत्रता की मांग के कारण जल्द ही एक प्रभावशाली नेता बन गए।
1938 और 1939 में वे कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए, लेकिन वैचारिक मतभेदों के चलते उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया। बोस का मानना था कि केवल राजनीतिक आंदोलनों से नहीं, बल्कि सशस्त्र संघर्ष से भी आज़ादी की राह बनाई जा सकती है।
आजाद हिंद फौज: नेताजी के पराक्रम का प्रतीक
देश को आज़ाद कराने के अपने संकल्प को साकार करने के लिए नेताजी ने आजाद हिंद फौज (INA) का गठन किया।
उन्होंने बर्लिन में फ्री इंडिया सेंटर की स्थापना की
आजाद हिंद रेडियो के जरिए स्वतंत्रता का संदेश दुनिया तक पहुंचाया
यूरोप और एशिया में भारतीय सैनिकों को संगठित कर एक सशक्त सेना खड़ी की
उनका ऐतिहासिक नारा—
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा”
आज भी हर भारतीय के रोंगटे खड़े कर देता है।
पराक्रम दिवस क्यों मनाया जाता है?
भारत सरकार ने वर्ष 2021 से हर साल 23 जनवरी को पराक्रम दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। इसका उद्देश्य नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साहस, नेतृत्व और बलिदान को याद करना और नई पीढ़ी को उनके विचारों से प्रेरित करना है।
निष्कर्ष
नेताजी सुभाष चंद्र बोस सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि त्याग, साहस और राष्ट्रभक्ति के प्रतीक थे। अंग्रेजी हुकूमत की नौकरी ठुकराकर और आजाद हिंद फौज के माध्यम से उन्होंने यह साबित किया कि देश की आज़ादी के लिए हर कुर्बानी छोटी है।
पराक्रम दिवस हमें याद दिलाता है कि आज़ादी केवल मिली नहीं थी, बल्कि उसे असंख्य बलिदानों से हासिल किया गया था।