Friday, January 9

न्यूक्लियर ठिकानों पर हमला न करे भारत, पाकिस्तानी प्रोफेसर की बड़ी मांग

 

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इस्लामाबाद। भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव के माहौल में पाकिस्तान के एक वरिष्ठ परमाणु मामलों के विशेषज्ञ ने भारत से परमाणु ठिकानों पर हमले से परहेज करने की अपील की है। इस्लामाबाद स्थित क़ायद-ए-आज़म यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक डॉ. जफर नवाज जसपाल ने कहा है कि किसी भी परमाणु सुविधा पर हमला पूरे दक्षिण एशिया को रेडियोलॉजिकल आपदा की ओर धकेल सकता है।

 

डॉ. जसपाल की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब पिछले वर्ष मई में हुए भारत-पाक संघर्ष के दौरान कई ओपन सोर्स इंटेलिजेंस एजेंसियों ने दावा किया था कि भारत ने पाकिस्तान के कैराना हिल्स इलाके को निशाना बनाया था। माना जाता है कि कैराना हिल्स में पाकिस्तान के अंडरग्राउंड परमाणु ठिकाने मौजूद हैं, जहां परमाणु हथियार रखे गए हैं। हालांकि भारत ने इन दावों को सिरे से खारिज किया था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां अपने निष्कर्षों पर कायम रहीं।

 

परमाणु हमले से मच सकती है भीषण तबाही

 

अपने लेख में डॉ. जसपाल ने चेतावनी दी कि किसी भी परमाणु सुविधा पर सैन्य हमला—चाहे वह जानबूझकर किया गया हो या गलती से—भयानक रेडियोलॉजिकल आपदा को जन्म दे सकता है। इससे न केवल वहां काम करने वाले कर्मचारी, बल्कि आसपास की नागरिक आबादी और पर्यावरण भी गंभीर रेडिएशन खतरे में आ सकते हैं।

 

उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही शांतिपूर्ण और सैन्य उद्देश्यों के लिए कई परमाणु प्रतिष्ठान संचालित करते हैं और दोनों देशों के बीच टकरावपूर्ण संबंध इस खतरे को और बढ़ा देते हैं।

 

1988 के गैर-हमला समझौते को बताया अहम

 

डॉ. जसपाल ने याद दिलाया कि 31 दिसंबर 1988 को भारत और पाकिस्तान के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ था, जिसके तहत दोनों देशों ने एक-दूसरे के परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं पर हमला न करने का संकल्प लिया था। यह समझौता जिनेवा कन्वेंशन के उन प्रावधानों पर आधारित है, जिनमें कहा गया है कि परमाणु संयंत्रों, बांधों और अन्य खतरनाक प्रतिष्ठानों पर हमला नहीं किया जाना चाहिए, भले ही वे सैन्य लक्ष्य ही क्यों न हों।

 

1 जनवरी 2026 को सूची साझा करना सकारात्मक कदम

 

उन्होंने कहा कि 1 जनवरी 1991 से दोनों देश हर साल एक-दूसरे को अपने परमाणु ठिकानों की सूची सौंपते आ रहे हैं और 1 जनवरी 2026 को भी तनावपूर्ण हालातों के बावजूद यह प्रक्रिया पूरी की गई, जो एक सकारात्मक संकेत है। हालांकि उनका मानना है कि अब इस समझौते में संशोधन की जरूरत है और नई परमाणु सुविधाओं को शामिल करते हुए सूचियों को अपडेट किया जाना चाहिए।

 

विश्वास बहाली की जरूरत

 

डॉ. जसपाल के मुताबिक, पिछले 34 वर्षों से यह गैर-हमला समझौता भारत-पाकिस्तान के बीच सबसे प्रभावी परमाणु विश्वास-निर्माण उपायों में से एक रहा है। उन्होंने दोनों देशों से अपील की कि वे परमाणु टकराव की किसी भी आशंका को खत्म करने के लिए इस समझौते को और मजबूत करें, ताकि दक्षिण एशिया को किसी भी तरह की परमाणु तबाही से बचाया जा सके।

 

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