Friday, February 13

बंगाल में मतदाता सूची पुनरीक्षण में चौंकाने वाला डेटा, एक महिला के एक महीने में दो बच्चों के जन्म ने बढ़ाई आयोग की मुश्किल

कोलकाता: पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान चुनाव आयोग को हैरान करने वाले कई अजीबोगरीब मामले सामने आए हैं। दस्तावेजों में दर्ज संदिग्ध जन्मतिथियों और अविश्वसनीय डेटा के कारण सत्यापन कार्य में भारी परेशानी हो रही है।

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चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि कई मामलों में जन्म प्रमाण पत्रों में दर्ज तिथियां वास्तविकता से मेल नहीं खा रहीं, जिससे मतदाता सूची का सत्यापन बेहद जटिल हो गया है।

एक महीने के भीतर दो बच्चों के जन्म का मामला

‘इकोनॉमिक टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, कोलकाता के दक्षिणी बाहरी क्षेत्र मेटियाबुरूज इलाके में एक परिवार के तीसरे और चौथे बच्चे की जन्मतिथियों में एक महीने से भी कम का अंतर दर्ज है।

दस्तावेजों में बच्चों की जन्मतिथि 5 दिसंबर 1990 और 1 जनवरी 1991 बताई गई है। चुनाव आयोग के मुताबिक, सुनवाई के दौरान जमा किए गए सभी दस्तावेजों में बच्चों के पिता का नाम एसके अब्दुल है और मां का नाम मनोवारा बीबी दर्ज है।

आयोग ने बताया कि परिवार के सभी 10 सदस्यों की पहचान कर ली गई है और सभी एक ही घर में निवास करते हैं। हैरानी की बात यह भी है कि परिवार के 10 बच्चों में से चार बच्चों की जन्मतिथि 1 जनवरी ही दर्ज है।

अनमैप्ड श्रेणी में 32 लाख नाम

चुनाव आयोग के अनुमान के अनुसार राज्य में करीब 32 लाख नाम अनमैप्ड श्रेणी में पाए गए हैं। ये ऐसे मतदाता हैं जिनका नाम या उनके परिजनों का नाम वर्ष 2002 की मतदाता सूची में दर्ज नहीं है।

दो दिन पहले जारी हुआ जन्म प्रमाण पत्र

एक अन्य मामला उत्तर 24 परगना जिले के बारानगर क्षेत्र से सामने आया है, जहां एक व्यक्ति का जन्म प्रमाण पत्र मात्र दो दिन पहले जारी किया गया।

सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि पपील सरकार द्वारा जमा किए गए दस्तावेज में जन्मतिथि 6 मार्च 1908 दर्ज है, जबकि उसका जन्म प्रमाण पत्र 4 मार्च 1993 को रजिस्टर किया गया था, यानी जन्म से दो दिन पहले ही प्रमाण पत्र जारी होने की तारीख दर्ज पाई गई।

आयोग ने शुरू की सख्त जांच

चुनाव आयोग ने ऐसे सभी संदिग्ध मामलों को इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) के पास सत्यापन के लिए भेज दिया है। आवश्यकता पड़ने पर संबंधित अस्पताल अथवा सरकारी रिकॉर्ड से भी दस्तावेजों की पुष्टि कराई जाएगी।

आयोग का कहना है कि मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन तय समयसीमा के अनुसार किया जाएगा, लेकिन गलत दस्तावेजों और फर्जी डेटा के कारण सत्यापन प्रक्रिया में अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ रही है।

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