कीव/मॉस्को: यूक्रेन ने युद्ध में रूसी टैंकों का भारी नुकसान किया है। T-72 और T-80 जैसे पुराने मॉडर्न वेरिएंट भी यूक्रेन की आधुनिक युद्ध तकनीक के सामने टिक नहीं पाए। युद्ध के मैदान में यूक्रेन के AI-सक्षम ड्रोन और आधुनिक अनमैनड सिस्टम ने रूस के भारी बख्तरबंद टैंक प्लेटफॉर्म को प्रभावी रूप से नष्ट किया।
रूस के पुराने टैंक क्यों हो रहे नाकाम
रूसी टैंक विशेषज्ञ और CAST (सेंटर फॉर एनालिसिस ऑफ स्ट्रैटेजीज एंड टेक्नोलॉजीज़) की रिपोर्ट के अनुसार, रूस का “ऑब्जेक्ट 195” और “आर्माटा” टैंक प्रोग्राम नई पीढ़ी के मेन बैटल टैंक बनाने में सफल नहीं हो पाया। इसकी कमी के कारण रूस T-72 और T-80 जैसे पुराने टैंकों पर निर्भर रहा।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि भारी टैंक और अटैक हेलीकॉप्टर अब आधुनिक युद्ध में ड्रोन स्वार्म्स के सामने कमजोर साबित हो रहे हैं। यूक्रेन के छोटे, कम लागत वाले AI-ड्रोन ने रूसी टैंकों को गहराई में जाकर निशाना बनाया और उन्हें तबाह कर दिया।
ड्रोन बदल रहे युद्ध की तस्वीर
यूक्रेन ने कम कीमत वाले ड्रोन का बड़े पैमाने पर उत्पादन और तैनाती कर रूस के भारी प्लेटफॉर्म को चुनौती दी। CAST का सुझाव है कि रूस को अब अपनी रणनीति में बदलाव कर एंटी-ड्रोन तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता विकसित करनी चाहिए।
भारत के लिए नज़र रखने का कारण
भारतीय सेना भी यूक्रेन युद्ध में रूस के टैंकों की प्रदर्शन क्षमता पर गहरी नजर रख रही है। भारत की बख्तरबंद ताकत मुख्य रूप से रूसी प्लेटफॉर्म पर निर्भर है, जैसे:
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T-90 भीष्म: भारतीय सेना का प्रमुख मेन बैटल टैंक, लगभग 1,300 यूनिट्स। मई 2024 में भीष्म Mk.3 का पहला बैच डिलीवर हुआ, जिसमें डिजिटल बैलिस्टिक कंप्यूटर, ऑटोमैटिक टारगेट ट्रैकर और एडवांस्ड थर्मल इमेजिंग जैसी खूबियां हैं।
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T-72 अजेय: सबसे भरोसेमंद टैंक, लगभग 2,400–2,500 यूनिट्स, लेकिन 40 साल से अधिक पुराने, धीरे-धीरे अपग्रेड या बदलने की तैयारी है।
स्वदेशीकरण और भविष्य की तैयारी
भारतीय सेना 2030 तक T-72 फ्लीट को फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल (FRCV) से बदलने की योजना पर काम कर रही है। इसके अलावा जोरावर लाइट टैंक को ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनाती के लिए परीक्षण किया जा रहा है। T-72 टैंकों के इंजन अपग्रेड के लिए भारत ने रूस के साथ 248 मिलियन डॉलर का समझौता भी किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारी रूसी टैंक पुराने युद्ध पैटर्न में कामयाब नहीं होंगे, और आधुनिक युद्ध में ड्रोन और हल्के, तेज़ प्लेटफॉर्म की अहमियत बढ़ रही है।