
प्रयागराज, विधि संवाददाता।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुलिस एनकाउंटर को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी आरोपी को सजा देने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है, पुलिस के पास नहीं। अदालत ने कहा कि एनकाउंटर के तुरंत बाद किसी भी पुलिस अधिकारी को आउट ऑफ टर्न प्रमोशन या गैलेंट्री अवॉर्ड नहीं दिया जाना चाहिए।
यह अहम टिप्पणी जस्टिस अरुण कुमार देशवाल की एकल पीठ ने मिर्जापुर के राजू उर्फ राजकुमार की जमानत याचिका स्वीकार करते हुए की। अदालत ने इस दौरान पुलिस एनकाउंटर से जुड़ी छह बिंदुओं वाली गाइडलाइंस भी जारी कीं।
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस की अनदेखी पर सवाल
हाई कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में एनकाउंटर को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस के अधिकारी कई मामलों में इनका पालन नहीं कर रहे हैं।
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि कई कथित एनकाउंटर मामलों में पुलिसकर्मियों को कोई चोट नहीं आती, जिससे हथियारों के इस्तेमाल और मुठभेड़ की परिस्थितियों पर सवाल खड़े होते हैं।
हाई कोर्ट द्वारा जारी 6 अहम गाइडलाइंस
- एफआईआर अनिवार्य
किसी मुठभेड़ में यदि आरोपी या कोई अन्य व्यक्ति घायल होता है या उसकी मौत होती है, तो पुलिस को तत्काल नजदीकी थाने में एफआईआर दर्ज करनी होगी। - स्वतंत्र जांच जरूरी
मुठभेड़ की जांच किसी वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी में CBCID या किसी अन्य थाने की स्वतंत्र पुलिस टीम द्वारा कराई जाएगी। - पुलिसकर्मियों के नाम आरोपी के रूप में जरूरी नहीं
प्राथमिकी में मुठभेड़ में शामिल पुलिसकर्मियों के नाम आरोपी या संदिग्ध के रूप में दर्ज करना अनिवार्य नहीं होगा। - घायलों को तत्काल चिकित्सा और बयान दर्ज
घायल व्यक्ति को तुरंत चिकित्सा सुविधा दी जाएगी। मजिस्ट्रेट या मेडिकल अधिकारी फिटनेस सर्टिफिकेट के आधार पर उसका बयान दर्ज करेंगे। - जांच पूरी होने के बाद ही पुरस्कार या प्रमोशन
एनकाउंटर के तुरंत बाद किसी पुलिस अधिकारी को आउट ऑफ टर्न प्रमोशन या वीरता पुरस्कार नहीं दिया जाएगा। केवल जांच कमेटी द्वारा उसकी बहादुरी संदेह से परे साबित होने पर ही सिफारिश की जा सकेगी। - नियम उल्लंघन पर शिकायत का अधिकार
यदि किसी मामले में नियमों का पालन नहीं हुआ, पक्षपात या दुर्व्यवहार हुआ, तो आरोपी के परिजन सत्र न्यायाधीश से शिकायत कर सकते हैं। सत्र न्यायाधीश आवश्यक कार्रवाई कर सकते हैं और गंभीर मामलों को हाई कोर्ट भेजा जा सकता है, जहां अवमानना की कार्रवाई शुरू की जा सकती है।
न्यायिक निगरानी पर ज़ोर
हाई कोर्ट ने साफ किया कि कानून के शासन में पुलिस को न्यायाधीश की भूमिका निभाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। प्रत्येक एनकाउंटर की निष्पक्ष, पारदर्शी और न्यायिक जांच अनिवार्य है।