
नई दिल्ली: भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) एक ऐतिहासिक व्यापार समझौते के मुहाने पर हैं। इसे यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयन ने ‘सभी सौदों का बाप’ कहा है। इस समझौते से दोनों पक्षों को महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ मिलेगा और चीन पर भारत की निर्भरता कम होगी। साथ ही, यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ व्यापार नीतियों को चुनौती भी देगा।
20 साल की बातचीत, रणनीतिक सफलता
भारत और ईयू के बीच एफटीए पर करीब दो दशकों से बातचीत चल रही है। 2013 में बातचीत रुकी, लेकिन जून 2022 में वैश्विक व्यापार और सुरक्षा की बदलती परिस्थितियों ने इसे पुनः गति दी। ट्रंप प्रशासन की संरक्षणवादी नीतियों और चीन के बढ़ते दबदबे ने भी भारत और ईयू को इस समझौते के लिए प्रेरित किया।
2025 में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयन की भारत यात्रा और 14 से अधिक वार्ता दौर, मंत्रिस्तरीय हस्तक्षेप और बाजार पहुंच व सेवाओं में अंतर को कम करने के प्रयासों ने इस समझौते को ऐतिहासिक मुकाम तक पहुँचाया। जनवरी 2026 में भारतीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की ब्रुसेल्स यात्रा भी इस प्रक्रिया का मील का पत्थर रही।
भारत के लिए फायदे
- 27 ईयू देशों के विशाल और स्थिर बाजार तक पहुंच।
- अमेरिकी टैरिफ से प्रभावित उद्योगों (कपड़ा, आभूषण, चमड़े) के लिए वैकल्पिक बाजार।
- आईटी सेवाओं और कुशल पेशेवरों के लिए अवसर।
- चीन पर निर्भरता में कमी और सप्लाई चेन में विविधता।
- रिन्यूएबल एनर्जी घटक उद्योग के लिए अनुकूल बाजार।
- रणनीतिक स्वायत्तता में वृद्धि।
ईयू के लिए फायदे
- भारत में निर्यात बढ़ाने का अवसर (विमान, ऑटोमोबाइल, विद्युत मशीनरी, रसायन)।
- सप्लाई चेन डायवर्सिफिकेशन और वैकल्पिक विनिर्माण स्थलों का विकास।
- निवेश और आर्थिक विकास में तेजी।
- जलवायु, सुरक्षा और बहुपक्षीय व्यापार में रणनीतिक साझेदारी का विस्तार।
ट्रंप के लिए झटका
ईयू-भारत FTA अमेरिकी टैरिफ और धमकियों के खिलाफ एक स्पष्ट संदेश है। यह अमेरिका पर भारत की निर्भरता घटाएगा और बहुध्रुवीय वैश्विक व्यापार व्यवस्था को मजबूत करेगा।
रणनीतिक महत्व
इस समझौते से भारत और ईयू वैश्विक व्यापार में नई बहुध्रुवीय व्यवस्था की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। यह आर्थिक और रणनीतिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है, जिससे दोनों अर्थव्यवस्थाओं का सहयोग और मजबूती से जुड़ता है।
निष्कर्ष:
ईयू-भारत FTA केवल व्यापार का समझौता नहीं, बल्कि वैश्विक रणनीति और बहुध्रुवीय सहयोग का प्रतीक है। यह दिखाता है कि भारत अब अपने व्यापारिक संबंधों में विविधता लाकर रणनीतिक स्वायत्तता को और मजबूत कर रहा है।