Saturday, January 17

बीएमसी चुनाव नतीजों पर संजय राउत का तीखा हमला, बोले—‘सिर्फ चार का बहुमत, मुंबई अडानी की जेब में नहीं जाने देंगे’

 

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मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनावों में शिवसेना (यूबीटी)–मनसे के शिवशक्ति गठबंधन की हार के बाद जहां सत्तारूढ़ भाजपा और एकनाथ शिंदे गुट जश्न मना रहे हैं, वहीं उद्धव ठाकरे के करीबी नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने चुनाव नतीजों को लेकर आक्रामक प्रतिक्रिया दी है।

 

संजय राउत ने कहा कि चुनावी नतीजों की तस्वीर उतनी एकतरफा नहीं है, जितनी दिखाई जा रही है। उन्होंने दावा किया कि शिवसेना (यूबीटी) की 12–13 सीटें और मनसे की कई सीटें बेहद कम मतों के अंतर से हारी हैं। अगर ये सीटें जीत ली जातीं, तो आज मुंबई की राजनीतिक तस्वीर बिल्कुल अलग होती।

 

‘भाजपा-शिंदे के पास सिर्फ चार का बहुमत’

 

राउत ने कहा कि भाजपा-शिंदे गठबंधन के पास बीएमसी में महज चार पार्षदों का बहुमत है। उन्होंने कहा, “महानगरपालिका के सदन में विपक्ष सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा है। हम मुंबई को अडानी की जेब में नहीं डालने देंगे और न ही ठेकेदारों का राज चलने देंगे।”

 

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि विपक्ष के 100 से अधिक पार्षद हर उस फैसले का विरोध करेंगे, जो मुंबई के हितों के खिलाफ होगा।

 

अपनी ही पार्टी में ‘जयचंद’ होने का आरोप

 

संजय राउत ने अपनी ही पार्टी के भीतर गद्दारी का आरोप लगाते हुए कहा, “हमारी पार्टी में कुछ जयचंद थे। अगर ये जयचंद पैदा नहीं होते, तो भाजपा की सौ पीढ़ियां भी मुंबई में मेयर नहीं बना पातीं।” राउत के इस बयान को पार्टी के अंदरूनी मतभेदों से जोड़कर देखा जा रहा है।

 

‘तख्तापलट कर सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र का सम्मान’

 

राउत ने यह भी कहा कि विपक्ष के पास ऐसे आंकड़े हैं, जिनके आधार पर कभी भी सत्ता परिवर्तन संभव है। हालांकि उन्होंने साफ किया कि उनकी पार्टी लोकतंत्र का सम्मान करती है और जनादेश का आदर करेगी।

 

बीएमसी में संख्या बल

 

गौरतलब है कि 2017 के बीएमसी चुनाव में भाजपा को 82 सीटें मिली थीं, जबकि इस बार पार्टी 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को 29 सीटें मिली हैं। वहीं शिवसेना (यूबीटी) और सहयोगी दलों सहित विपक्ष के पास 109 से अधिक पार्षद हैं, जबकि सत्ता पक्ष के पास कुल 118 पार्षद हैं।

 

बीएमसी में उद्धव ठाकरे गुट का यह पहला चुनाव रहा, जिसके बाद महाराष्ट्र की राजनीति में सियासी बयानबाज़ी और तेज़ हो गई है।

 

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