Saturday, January 17

तेजस्वी यादव की ‘समीक्षा बैठक’ पर सवाल, विधायक नदारद—तो फिर मकसद क्या था?

 

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में मिली करारी हार के बाद नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने समीक्षा बैठक तो की, लेकिन यह बैठक समाधान से ज़्यादा सवाल छोड़ गई। राजनीतिक गलियारों में जहां इस बैठक से जवाबदेही तय होने और भीतरघातियों पर कार्रवाई की उम्मीद की जा रही थी, वहीं हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखी।

 

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि खुद को ‘समीक्षात्मक’ बताने वाली इस बैठक में पार्टी के एक भी विधायक शामिल नहीं थे। जबकि एनडीए के नेता लगातार यह दावा कर रहे हैं कि राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के 18 विधायक उनके संपर्क में हैं। ऐसे समय में विधायकों से दूरी ने तेजस्वी यादव की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

विधायकों के बिना समीक्षा?

 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर बैठक का उद्देश्य चुनावी हार की समीक्षा था, तो सबसे अहम भूमिका निभाने वाले विधायकों को बाहर रखना समझ से परे है। बैठक में केवल लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य मौजूद थे। इससे यह संदेश गया कि तेजस्वी यादव पार्टी के भीतर पैदा हुए राजनीतिक शून्य को सांसदों के सहारे भरने की कोशिश कर रहे हैं।

 

विधानसभा सत्र से पहले भी चुप्पी

 

यह बैठक ऐसे समय हुई है जब बिहार विधानसभा का सत्र 2 फरवरी से शुरू होने वाला है। सवाल यह भी उठता है कि सत्र में सरकार को घेरने की रणनीति क्या होगी? स्थानीय मुद्दे कौन से होंगे? विपक्ष की भूमिका कैसे निभाई जाएगी? इन तमाम सवालों के जवाब तभी मिलते जब विधायकों के साथ संवाद होता।

 

पारिवारिक राजनीति की परछाईं

 

तेजस्वी यादव की इस बैठक को लेकर पार्टी के भीतर से ही असंतोष के स्वर उठने लगे हैं। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने इस बैठक को ‘दिखावा’ करार दिया। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि हार की जिम्मेदारी लेने से पहले नेतृत्व को अपने आसपास मौजूद ‘गिद्धों’ पर कार्रवाई करनी चाहिए।

 

रोहिणी आचार्य ने स्पष्ट कहा कि बेहतर नेतृत्व के अभाव और टिकट वितरण में हुई गलतियों के कारण ही राजद को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।

 

राजनीतिक संदेश साफ

 

कुल मिलाकर तेजस्वी यादव की यह बैठक संगठन को एकजुट करने से ज़्यादा भ्रम पैदा करती दिखी। विधायकों की गैरमौजूदगी, जवाबदेही से बचाव और पारिवारिक मतभेद—ये सभी संकेत देते हैं कि राजद में फिलहाल रणनीति से ज़्यादा असमंजस हावी है।

 

अब असल सवाल यही है—क्या यह बैठक वाकई समीक्षा के लिए थी, या फिर पार्टी के भीतर उठती आवाज़ों को संतुलित करने की एक कोशिश मात्र?

 

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