Saturday, January 17

ट्रंप की ट्रेड डील से भारत की चिप इंडस्ट्री पर खतरा, चीन भी नाराज

नई दिल्ली: अमेरिका और ताइवान के बीच हाल ही में हुई 500 अरब डॉलर की बड़ी ट्रेड डील ने वैश्विक तकनीकी बाजार में हलचल पैदा कर दी है। इस समझौते के तहत ताइवानी सामानों पर अमेरिकी टैक्स 20% से घटाकर 15% कर दिया जाएगा। इसके बदले में ताइवान अमेरिका के टेक्नोलॉजी सेक्टर में 250 अरब डॉलर का निवेश करेगा, जिसमें कारखाने, रिसर्च लैब और औद्योगिक पार्क शामिल हैं। इसके अलावा, ताइवान विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए 250 अरब डॉलर की क्रेडिट गारंटी भी देगा।

This slideshow requires JavaScript.

इस डील का उद्देश्य अमेरिकी सेमीकंडक्टर और AI उद्योग को मजबूत करना है। ताइवानी कंपनियां अमेरिका में सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में निवेश करेंगी। इसके अलावा, कुछ आयातित सामानों जैसे जेनेरिक दवाओं और हवाई जहाज के पुर्जों को टैक्स में राहत मिलेगी।

भारत के लिए चुनौती
भारत अपनी पहली ‘मेड इन इंडिया’ चिप का तेजी से विस्तार करने की योजना में है। इसके लिए सरकार ने इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM), सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम और PLI योजनाएं शुरू की हैं। विक्रम-3201 जैसी स्वदेशी चिप्स पहले ही विकसित हो चुकी हैं, और साल 2030 तक भारत का चिप बाजार 110 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।
लेकिन अमेरिका-ताइवान डील के चलते कई चिप कंपनियों का रुख अमेरिका की ओर बढ़ सकता है। इससे भारत की घरेलू चिप उत्पादन योजना और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ सकता है।

चीन की नाराजगी
चीन ने इस समझौते का कड़ा विरोध किया है। बीजिंग ने इसे ताइवान पर ‘आर्थिक दबाव’ और अमेरिका द्वारा ‘निर्यात नियंत्रण’ का हिस्सा बताया। चीन ने अमेरिका से ‘एक-चीन सिद्धांत’ का पालन करने का आग्रह किया है।

इस डील से स्पष्ट है कि वैश्विक तकनीक और निवेश की दिशा में बड़ा बदलाव आने वाला है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अपनी चिप उत्पादन और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर योजनाओं को तेजी से सशक्त बनाए, ताकि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे न रह जाए।

 

Leave a Reply