
नई दिल्ली।
दक्षिण अफ्रीका के तट के पास ब्रिक्स देशों का संयुक्त नौसैनिक युद्धाभ्यास ‘विल फॉर पीस 2026’ शुरू हो गया है। इस अभ्यास में रूस, चीन और ईरान जैसे सदस्य देश शामिल हैं, जबकि भारत और ब्राजील ने इसमें भाग नहीं लिया। यह युद्धाभ्यास 9 से 16 जनवरी 2026 तक केप ऑफ गुड होप में हो रहा है, जहां हिंद महासागर अटलांटिक महासागर से मिलता है।
अभ्यास का उद्देश्य और भागीदार
चीन की अगुवाई में हो रहे इस अभ्यास में बचाव और समुद्री हमले के अभियानों का प्रशिक्षण शामिल है। इसमें रूस और संयुक्त अरब अमीरात ने कोरवेट भेजे हैं, चीन और ईरान ने विध्वंसक पोत तैनात किए हैं, जबकि दक्षिण अफ्रीका ने मध्यम आकार का फ्रिगेट रखा है। ब्राजील, मिस्र, इंडोनेशिया और इथियोपिया पर्यवेक्षक के रूप में शामिल हैं।
दक्षिण अफ्रीका के संयुक्त कार्य बल के कमांडर कैप्टन नंदवाखुलु थॉमस थमाहा ने कहा कि यह अभ्यास सिर्फ सैन्य अभ्यास नहीं, बल्कि ब्रिक्स देशों के बीच साझा संकल्प और सहयोग का प्रतीक है। उनका कहना था कि जटिल समुद्री वातावरण में एक साथ काम करना कोई विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है।
भू-राजनीतिक पृष्ठभूमि
इस युद्धाभ्यास की पृष्ठभूमि में अमेरिका द्वारा रूसी तेल टैंकर को उत्तरी अटलांटिक में जब्त करना और वेनेजुएला पर सैन्य दबाव डालना भी शामिल है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन, रूस और ईरान के साथ संबंधों में तनाव बढ़ाया है और भारत पर भारी टैरिफ लगाए हैं। इस कारण ब्रिक्स के कुछ देशों के प्रति अमेरिका की चेतावनी और आलोचना भी बढ़ी है।
भारत और ब्राजील की दूरी
ब्रिक्स के दो संस्थापक सदस्य भारत और ब्राजील ने सैन्य अभ्यास में हिस्सा नहीं लिया। इसके पीछे कारण यह है कि ब्रिक्स मूल रूप से आर्थिक और विकासशील देशों का संगठन है, जिसका उद्देश्य व्यापार और सहयोग को मजबूत करना है, न कि सैन्य गठबंधन बनाना। भारत ने अपने अमेरिका के साथ संबंधों को संतुलित रखते हुए दूरी बनाई है। थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के विश्लेषक हर्ष पंत के अनुसार, भारत के लिए ब्रिक्स युद्धाभ्यास में शामिल होना व्यावहारिक और नैतिक दोनों दृष्टियों से उचित नहीं है।
निष्कर्ष
‘विल फॉर पीस 2026’ युद्धाभ्यास ने ब्रिक्स प्लस देशों के समुद्री सहयोग और रणनीतिक संकल्प को उजागर किया है, लेकिन भारत और ब्राजील की दूरी इस बात को भी दर्शाती है कि ब्रिक्स का प्राथमिक उद्देश्य सैन्य गठबंधन नहीं, बल्कि आर्थिक और विकास सहयोग है। इस अभ्यास के माध्यम से वैश्विक समुद्री सुरक्षा, साझा परिचालन और रणनीतिक तालमेल पर जोर दिया गया है।