
नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने विधवा बहू को ससुर की संपत्ति से गुजारा भत्ता (भरण-पोषण) का अधिकार देने वाला अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि अगर किसी महिला की विधवा होने की स्थिति ससुर की मृत्यु के बाद होती है, तब भी वह हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत भरण-पोषण का दावा कर सकती है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मनुस्मृति का भी हवाला देते हुए सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी पर जोर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि पहले यह भ्रम था कि बहू को ससुर के मरने के बाद भरण-पोषण का अधिकार नहीं है। अदालत ने इसे गलत और बेतुका बताया। न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और एस.वी.एन. भट्टी की बेंच ने कहा कि चाहे बहू ससुर के जीवित रहते हुए विधवा हो या उनके मरने के बाद, दोनों ही स्थितियों में वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार है।
कानून की धारा 22 के तहत जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम की धारा 22 का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी मृतक की संपत्ति से उसके आश्रितों का भरण-पोषण करना वारिसों की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है। इसमें विधवा बहू भी शामिल है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि बहू अपनी कमाई से अपना भरण-पोषण नहीं कर पा रही है, तो यह जिम्मेदारी लागू होती है।
मनुस्मृति का हवाला
अदालत ने यह भी कहा कि समाज और कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी परिवार का सदस्य अकेला न रहे। सुप्रीम कोर्ट ने मनुस्मृति का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी मां, पिता, पत्नी या बेटे को अकेला नहीं छोड़ा जाना चाहिए, और ऐसा करने वाले को जुर्माना भुगतना पड़ सकता है।
निष्कर्ष
इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि विधवा बहू को न्याय और सुरक्षा दोनों मिलेंगी, चाहे वह ससुर के जीवनकाल में विधवा हुई हो या उनके निधन के बाद। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश परिवार में आपसी सहयोग और सामाजिक जिम्मेदारी की अहमियत को भी रेखांकित करता है।