
नई दिल्ली: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का पीएसएलवी-सी62 मिशन सोमवार को असफल रहा। रॉकेट के तीसरे चरण में तकनीकी गड़बड़ी के कारण 16 उपग्रहों को कक्षा में स्थापित नहीं किया जा सका, जिसमें DRDO का मुख्य सैटेलाइट EOS-N1 (Anvesha) भी शामिल था। यह 9 महीनों में PSLV की दूसरी असफलता है, जिससे इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।
तीसरे चरण में तकनीकी समस्या
इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन ने बताया कि रॉकेट ने पहले तीन चरणों तक पूरी तरह सही प्रदर्शन किया। लेकिन तीसरे चरण के अंत में रॉकेट की उड़ान में हल्का बदलाव आया और इसका रास्ता बदल गया, जिससे मिशन विफल हो गया। वैज्ञानिक टीम सभी ग्राउंड स्टेशनों से प्राप्त आंकड़ों का अध्ययन कर रही है।
PSLV एक चार–चरणों वाला रॉकेट है:
- पहला चरण – ठोस ईंधन
- दूसरा चरण – तरल ईंधन
- तीसरा चरण – ठोस ईंधन
- चौथा चरण – तरल ईंधन
महत्वपूर्ण और अंतरराष्ट्रीय पेलोड
PSLV-सी62 मिशन में नेपाल के लिए मुनल सैटेलाइट, स्टार्टअप OrbitAID का टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर और 13 अन्य पेलोड शामिल थे। मिशन का उद्देश्य ऑन–ऑर्बिट रीफ्यूलिंग तकनीक का परीक्षण करना भी था, जिसमें भारत चीन के बाद इस क्षेत्र में कदम बढ़ा रहा है।
OrbitAID के संस्थापक सकथिकुमार आर. ने बताया, “अब हमें लक्ष्य और चेजर दोनों उपग्रहों को एक साथ लॉन्च करना पड़ेगा। उम्मीद है कि साल के अंत तक ऐसा संभव होगा।”
इसरो के मिशन में यूके, ब्राजील, थाईलैंड और स्पेन के सैटेलाइट भी शामिल थे। इसके अलावा भारतीय स्टार्टअप्स के तकनीकी पेलोड जैसे AI प्रोसेसिंग, स्टोर–एंड–फॉरवर्ड कम्युनिकेशन, कृषि डेटा संग्रह और री–एंट्री कैप्सूल भी इस मिशन का हिस्सा थे।
इसरो के लिए चुनौती
जनवरी 2025 से यह इसरो की तीसरी लॉन्च विफलता है। इससे पहले GSLV-F15 और PSLV-सी61 मिशन में भी तकनीकी समस्याओं के कारण उपग्रह कक्षा में नहीं पहुँच सके थे। PSLV की लगातार दो बार असफलता ने अंतरिक्ष और रक्षा विशेषज्ञों के बीच चिंता बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि PSLV की विश्वसनीयता पर भरोसा बनाए रखने के लिए आगे तकनीकी सुधार और कड़ी जांच जरूरी है।