
एलन मस्क की सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस स्टारलिंक (Starlink) दुनिया के कई देशों में उपलब्ध है, लेकिन अभी भी कुछ देशों में इसकी सेवाएं शुरू नहीं हुई हैं। इनमें से एक देश है साउथ अफ्रीका, जहां मस्क ने हाल ही में एक बयान में कहा कि उन्हें देश में सेवा शुरू करने की मंजूरी इसलिए नहीं मिली, क्योंकि वह अश्वेत (काले) नहीं हैं।
मस्क का बयान और विवाद
- मस्क ने कहा कि साउथ अफ्रीका में लगभग 140 कानून अश्वेत या ब्लैक समुदाय को प्राथमिकता देते हैं और अन्य रंग के लोगों के लिए जगह नहीं है।
- उन्होंने इसे सोशल मीडिया पोस्ट में साझा किया और कहा कि यही कारण है कि स्टारलिंक वहां काम नहीं कर पा रहा।
वास्तविक वजह क्या है?
बीबीसी और अन्य रिपोर्टों के अनुसार, मस्क का दावा केवल बयान तक सीमित है। सच्चाई यह है कि स्टारलिंक ने साउथ अफ्रीका में लाइसेंस के लिए आवेदन ही नहीं किया। पिछले साल साउथ अफ्रीका का विदेश मंत्रालय स्पष्ट कर चुका है कि अगर कंपनी स्थानीय कानूनों का पालन करती है, तो लाइसेंस मिल सकता है।
साउथ अफ्रीका के कानून
- देश के नियमों के अनुसार, स्टारलिंक को काम करने के लिए नेटवर्क लाइसेंस हासिल करना होगा।
- इस लाइसेंस के लिए कंपनी का 30% शेयर ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदाय के पास होना चाहिए, जो मुख्य रूप से अश्वेत आबादी को ध्यान में रखकर तय किया गया है।
स्टारलिंक क्या है?
- स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस है, जो ब्रॉडबैंड और मोबाइल इंटरनेट से अलग तकनीक से इंटरनेट पहुंचाती है।
- इस प्रणाली में सैटेलाइट से सिग्नल सीधे घर की छत या बाहरी किट तक पहुंचते हैं, जिन्हें राउटर या मॉडेम के जरिए इंटरनेट में बदला जाता है।
भारत में मंजूरी मिल चुकी है
- भारत में स्टारलिंक को सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस के लिए मंजूरी दी जा चुकी है।
- कंपनी ने सभी शर्तों को मान लिया है और अब ट्रायल शुरू होना बाकी है। उम्मीद है कि 2026 में भारत में स्टारलिंक की सेवाएं शुरू हो सकती हैं।
- हालांकि, यह सेवा पारंपरिक ब्रॉडबैंड और मोबाइल इंटरनेट की तुलना में महंगी है।
विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों का कहना है कि साउथ अफ्रीका में स्टारलिंक के कार्यान्वयन में देरी कानूनी नियमों और शेयरिंग शर्तों के कारण है, न कि मस्क के रंग के कारण।