
वॉशिंगटन। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का दायरा तेजी से बढ़ता जा रहा है और अब इसका असर स्वास्थ्य सेवाओं पर भी साफ दिखने लगा है। अमेरिका के यूटा राज्य ने इस दिशा में एक अनोखा और विवादित कदम उठाया है। यूटा अमेरिका का पहला राज्य बन गया है, जहां एआई कुछ खास तरह की दवाओं के पर्चों को बिना डॉक्टर की सीधी दखल के रिन्यू करेगा। यह व्यवस्था फिलहाल एक पायलट प्रोजेक्ट के तहत लागू की गई है, जिसने हेल्थ सेक्टर में नई बहस छेड़ दी है।
क्या है यह नया प्रयोग?
रिपोर्ट्स के अनुसार, यूटा सरकार ने Doctronic नाम की एक हेल्थ-टेक कंपनी के साथ मिलकर इस प्रोजेक्ट की शुरुआत की है। इसके तहत एआई सिस्टम उन मरीजों के लिए दवाओं के पर्चे को रिन्यू करेगा, जो पहले से किसी पुरानी (क्रॉनिक) बीमारी से पीड़ित हैं और नियमित रूप से वही दवाएं ले रहे हैं।
इस प्रक्रिया में डॉक्टर की प्रत्यक्ष भूमिका नहीं होगी, बल्कि एआई मरीज के मेडिकल रिकॉर्ड और डेटा के आधार पर पर्चा आगे बढ़ाएगा।
मरीजों का भरोसा सबसे बड़ा सवाल
इस योजना को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या मरीज एआई द्वारा रिन्यू किए गए पर्चे पर भरोसा कर पाएंगे?
पॉलिटिको की रिपोर्ट के मुताबिक, सुरक्षा, जवाबदेही और रेगुलेशन जैसे अहम मुद्दों पर अब भी स्थिति साफ नहीं है। खास बात यह है कि अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने अभी तक इस योजना पर कोई आधिकारिक रुख नहीं अपनाया है। माना जा रहा है कि अगर FDA ने इसे सख्ती से रेगुलेट किया, तो इस प्रोजेक्ट का विस्तार सीमित रह सकता है।
सरकार के तर्क क्या हैं?
यूटा राज्य के अधिकारी इस पहल के समर्थन में खड़े हैं। उनका कहना है कि इससे
- डॉक्टरों पर बढ़ता काम का बोझ कम होगा,
- स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत पर लगाम लगेगी,
- और ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की कमी की समस्या से निपटने में मदद मिलेगी।
यूटा डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर मार्गरेट बुसे ने कहा कि हेल्थकेयर का खर्च लगातार बढ़ रहा है। अगर रूटीन पर्चों को ऑटोमेट किया जा सके, तो डॉक्टर गंभीर मामलों पर ज्यादा ध्यान दे पाएंगे और मरीजों का खर्च भी घटेगा।
मेडिकल जगत की चिंता
हालांकि, मेडिकल पेशे से जुड़े संगठनों ने इस फैसले पर गंभीर चिंता जताई है। अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (AMA) का कहना है कि एआई स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने में मददगार हो सकता है, लेकिन डॉक्टर की सलाह के बिना दवाओं से जुड़े फैसले लेना खतरनाक साबित हो सकता है।
मेडिकल विशेषज्ञों के मुताबिक, हर मरीज की स्थिति एक जैसी नहीं होती और मशीन सभी पहलुओं को समझने में चूक कर सकती है, जिससे मरीज और डॉक्टर—दोनों के लिए जोखिम बढ़ सकता है।
आगे क्या?
फिलहाल यह योजना शुरुआती चरण में है, लेकिन अगर यह सफल रही तो भविष्य में अन्य राज्यों और देशों में भी इसे अपनाने की कोशिश हो सकती है। वहीं, अगर सुरक्षा और भरोसे से जुड़े सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो यह प्रयोग बड़े विवाद की वजह भी बन सकता है।