
नई दिल्ली। भारत सरकार देश की अर्थव्यवस्था को मापने के तरीके में एक अहम बदलाव की दिशा में कदम बढ़ा रही है। अब तक आर्थिक सेहत का सबसे प्रमुख पैमाना माने जाने वाले सकल घरेलू उत्पाद (ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट—जीडीपी) की जगह भविष्य में शुद्ध घरेलू उत्पाद (नेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट—एनडीपी) को ज्यादा महत्व दिया जा सकता है। यह बदलाव संयुक्त राष्ट्र की राष्ट्रीय खातों की प्रणाली (SNA) 2025 के तहत प्रस्तावित है।
आर्थिक मामलों से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, एसएनए 2025 में एनडीपी को जीडीपी जैसे सकल मापों की तुलना में वैचारिक रूप से अधिक सटीक और बेहतर बताया गया है। एनडीपी न केवल कुल उत्पादन को दर्शाता है, बल्कि उत्पादन के दौरान संपत्तियों के मूल्य में आई कमी (डेप्रिसिएशन) और प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण (डिप्लीशन) को भी शामिल करता है। इससे अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति और दीर्घकालिक स्थिरता का ज्यादा स्पष्ट आकलन संभव होता है।
अभी क्या है व्यवस्था
वर्तमान में भारत समेत पूरी दुनिया में जीडीपी को ही अर्थव्यवस्था की सेहत का मुख्य संकेतक माना जाता है। भारत सरकार फिलहाल जीडीपी के साथ-साथ एनडीपी के वार्षिक अनुमान जारी करती है, लेकिन तिमाही एनडीपी आंकड़े प्रकाशित नहीं किए जाते। हाल ही में वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत रही, जो बीते छह तिमाहियों में सबसे अधिक है। वहीं, 2024-25 में जीडीपी और एनडीपी दोनों में सालाना आधार पर 6.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
एनडीपी की गणना कैसे होती है
एनडीपी की गणना जीडीपी में से स्थायी परिसंपत्तियों के डेप्रिसिएशन और प्राकृतिक संसाधनों के डिप्लीशन को घटाकर की जाती है। डेप्रिसिएशन का अर्थ है उत्पादन में उपयोग होने वाली मशीनों, इमारतों और अन्य पूंजीगत संपत्तियों के मूल्य में आई कमी। वहीं, डिप्लीशन प्राकृतिक संसाधनों—जैसे खनिज, वन और अन्य सीमित संसाधनों—के उपयोग से भविष्य में होने वाले आर्थिक नुकसान को दर्शाता है। इस तरह एनडीपी यह बताता है कि देश अपनी संपत्ति का कितना उपभोग कर रहा है और भविष्य के लिए कितना संरक्षित रख पा रहा है।
सरकार की आगे की योजना
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) इस बदलाव को लागू करने के लिए जरूरी आंकड़ों और पद्धतियों की समीक्षा कर रहा है। राष्ट्रीय खाता सांख्यिकी पर सलाहकार समिति के अंतर्गत एक उप-समिति गठित की गई है, जो इस प्रक्रिया का मार्गदर्शन करेगी। अधिकारियों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के दिशानिर्देशों के अनुरूप इस नई प्रणाली को 2029-30 तक लागू करने का लक्ष्य रखा गया है।
इसके साथ ही सरकार जीडीपी के आधार वर्ष में भी बदलाव करने जा रही है। वर्तमान में आधार वर्ष 2011-12 है, जिसे बदलकर 2022-23 किया जाएगा। यह नई श्रृंखला 27 फरवरी को जारी होने की संभावना है और यह SNA 2008 ढांचे पर आधारित होगी, जो फिलहाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एनडीपी को मुख्य पैमाना बनाया जाता है, तो इससे भारत की अर्थव्यवस्था की वास्तविक मजबूती, संसाधनों के उपयोग और दीर्घकालिक विकास की अधिक सटीक तस्वीर सामने आ सकेगी।