
अब तक आलू की खेती का मतलब जमीन के नीचे कंद उगाना माना जाता था, लेकिन हरियाणा के करनाल जिले में स्थित शामगढ़ के आलू प्रौद्योगिकी संस्थान में यह धारणा बदल रही है। यहां वैज्ञानिकों ने एरोपोनिक तकनीक के जरिए हवा में आलू उगाने का सफल प्रयोग किया है, जिसने किसानों और आम लोगों का ध्यान आकर्षित किया है।
संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार, उच्च गुणवत्ता के बीज किसानों तक पहुंचाने के उद्देश्य से एरोपोनिक सिस्टम अपनाया गया है। इस तकनीक में आलू के पौधों की जड़ें मिट्टी में नहीं, बल्कि हवा में लटकी रहती हैं। जड़ों को आवश्यक पोषक तत्व पानी की महीन फुहार के रूप में सीधे पहुंचाए जाते हैं। इससे पौधों में रोग लगने की संभावना बेहद कम हो जाती है और उत्पादन की गुणवत्ता भी बेहतर होती है।
आलू प्रौद्योगिकी संस्थान में विकसित की गई नई किस्म ‘कुफरी उदय’ को किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी बताया जा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह किस्म न केवल अधिक पैदावार देती है, बल्कि पोषण से भरपूर भी है। इससे किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद मिलेगी और उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता का आलू उपलब्ध हो सकेगा।
संस्थान के उप निदेशक डॉ. मनोज भानुकर ने बताया कि यहां भारत सरकार से मान्यता प्राप्त टिश्यू कल्चर लैब स्थापित है। सीपीआरआई से लाए गए टिश्यू कल्चर से पौध तैयार की जाती है, जिन्हें एरोपोनिक प्लांट में लगाया जाता है। पौध लगाने के 70 से 75 दिनों के भीतर उत्पादन शुरू हो जाता है, जो लगभग 90 दिनों तक चलता है। चूंकि सभी पोषक तत्व सीधे जड़ों तक पहुंचते हैं, इसलिए रोग का खतरा लगभग समाप्त हो जाता है।
संस्थान न केवल किसानों को उच्च गुणवत्ता की पौध उपलब्ध करा रहा है, बल्कि उन्हें इस आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण भी दे रहा है। कई किसान जब पहली बार हवा में उगते आलू देखते हैं तो हैरान रह जाते हैं। इससे उनमें नई तकनीक सीखने और अपनाने की उत्सुकता बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि एरोपोनिक तकनीक भविष्य की खेती की दिशा तय कर सकती है। यह न केवल उत्पादन बढ़ाने में सहायक है, बल्कि किसानों को आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।