
वॉशिंगटन: वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति एक बार फिर वैश्विक बहस के केंद्र में आ गई है। इस कार्रवाई के बाद ट्रंप ने जिस शब्द का इस्तेमाल किया— ‘डोनरो डॉक्ट्रिन’— उसने संकेत दे दिया है कि अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध में अपनी पुरानी वर्चस्ववादी नीति को नए और आक्रामक रूप में लागू करने की तैयारी में है।
ट्रंप द्वारा ‘डोनरो डॉक्ट्रिन’ का जिक्र दरअसल अमेरिका की दो सदियों पुरानी मोनरो डॉक्ट्रिन का आधुनिक और कठोर संस्करण माना जा रहा है। मोनरो सिद्धांत 1800 के दशक में यूरोपीय उपनिवेशवाद के खिलाफ चेतावनी के रूप में सामने आया था, लेकिन इतिहास बताता है कि इसी सिद्धांत के नाम पर अमेरिका ने क्यूबा, हैती, निकारागुआ और डोमिनिकन रिपब्लिक जैसे देशों में दखलअंदाजी को सही ठहराया।
वेनेजुएला के बाद किसकी बारी?
वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन के बाद अब यह सवाल तेज हो गया है कि अगला निशाना कौन होगा। ट्रंप प्रशासन के हालिया बयानों से संकेत मिलते हैं कि अमेरिका की नजर अब ग्रीनलैंड, कोलंबिया और क्यूबा पर है।
ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क का हिस्सा है और नाटो सदस्य देश के अंतर्गत आता है, आर्कटिक क्षेत्र में रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जाता है। ट्रंप पहले भी इस इलाके को लेकर रुचि जता चुके हैं। वहीं, कोलंबिया को लेकर ट्रंप की खुली चेतावनी और क्यूबा के ‘जल्द गिरने’ वाले बयान ने लैटिन अमेरिका में चिंता बढ़ा दी है।
‘यह हमारा गोलार्ध है’
अमेरिकी विदेश विभाग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बयान जारी करते हुए कहा,
“यह हमारा गोलार्ध है और राष्ट्रपति ट्रंप अमेरिका की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेंगे।”
विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भी साफ कहा कि अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध को अपने विरोधियों के लिए ऑपरेशन बेस नहीं बनने देगा। इस बयान ने अमेरिका की नीति की तुलना रूस द्वारा यूक्रेन पर किए गए हमले से जोड़ दी है, जिस पर वैश्विक स्तर पर दोहरे मापदंडों का आरोप लग रहा है।
चीन, रूस और ईरान से टकराव
ट्रंप का तर्क है कि वेनेजुएला की तेल इंडस्ट्री पर चीन, रूस और ईरान का बढ़ता प्रभाव अमेरिका की दो सदियों पुरानी विदेश नीति का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि मोनरो डॉक्ट्रिन को अब पीछे छोड़ दिया गया है और यही नया रूप ‘डोनरो डॉक्ट्रिन’ है।
दुनिया की चिंता बढ़ी
विशेषज्ञों का मानना है कि डोनरो डॉक्ट्रिन का अर्थ केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि सरकारें गिराने, सत्ता परिवर्तन और अमेरिकी हितों के अनुसार शासन स्थापित करने की नीति हो सकता है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या अमेरिका एक बार फिर ‘सुपरपावर’ बने रहने के लिए सैन्य और राजनीतिक दबाव का रास्ता अपनाएगा?
वेनेजुएला की घटना के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी भी कई सवाल खड़े कर रही है। अब दुनिया की नजर इस पर टिकी है कि ट्रंप की अगली चाल क्या होगी— और क्या पश्चिमी गोलार्ध एक बार फिर वैश्विक टकराव का केंद्र बनेगा।