
प्रभास पाटन, गुजरात: देश के प्रमुख तीर्थस्थलों में शामिल सोमनाथ मंदिर का इतिहास अत्यंत गौरवशाली और चुनौतीपूर्ण रहा है। यह मंदिर न केवल 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है, बल्कि इतिहास में बार-बार हमलों का भी शिकार रहा। इतिहासकारों के अनुसार, सोमनाथ मंदिर पर कुल 17 बार हमला हुआ, जिसमें मुगलों ने इसे कई बार लूटा।
सोमनाथ मंदिर का उल्लेख शिव पुराण के अध्याय-13 में भी मिलता है। यह गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में समुद्र तट पर स्थित है और इसे सोने-चांदी व रत्नों से सजाया गया था।
महमूद गजनवी का पहला हमला:
मंदिर पर हमलों की शुरुआत 11वीं सदी में हुई थी। 1026 में भीम प्रथम के शासनकाल के दौरान तुर्की शासक महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर हमला किया और इसे लूट लिया। इस दौरान ज्योतिर्लिंग को भी तोड़ दिया गया।
अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण:
1299 में गुजरात पर फिर हमला हुआ। इस बार अलाउद्दीन खिलजी की सेना के सेनापति उलुघ खान ने वाघेला राजा कर्ण को पराजित कर सोमनाथ मंदिर को लूटा।
पुनर्निर्माण और बाद के हमले:
1308 में चूड़ासमा राजा महिपाल प्रथम ने मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। उनके पुत्र खेंगारा ने 1331 और 1351 के बीच लिंगम की स्थापना की। लेकिन 1395 में जफर खान ने मंदिर पर हमला किया और इसे नष्ट कर दिया। इस तरह लगातार हमलों के बावजूद मंदिर का पुनर्निर्माण होता रहा।
भव्यता में वृद्धि:
मंदिर की वर्तमान भव्यता तब बढ़ी, जब भारत के लौह पुरुष और उप–प्रधान मंत्री सदार वल्लभभाई पटेल ने 12 नवंबर 1947 को जूनागढ़ आकर सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का आदेश दिया। मंदिर निर्माण और देखरेख के लिए सोमनाथ ट्रस्ट की स्थापना की गई। 11 मई 1951 को भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर में मूर्ति स्थापना की।
वर्तमान चर्चा:
सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष भारत के प्रधानमंत्री हैं। इस समय मंदिर चर्चा में है क्योंकि 1026 में हुए पहले आक्रमण की 1000वीं वर्षगांठ पूरी हुई है। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सोमनाथ मंदिर को लेकर एक विशेष लेख लिखा है।
सोमनाथ मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि हमारी इतिहास और संस्कृति की शान भी है।