
मॉस्को: रूस में श्रमिकों की कमी और घटती युवा आबादी देश के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। यूक्रेन युद्ध और देश छोड़कर गए युवाओं के कारण रूस को अगले पांच साल में लाखों अतिरिक्त श्रमिकों की आवश्यकता होगी। ऐसे में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने हाल ही में भारत का दौरा किया और पीएम नरेंद्र मोदी से मुलाकात के दौरान भारत से लगभग 10 लाख मजदूरों को रूस भेजने की योजना पर सहमति बनी।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम रूस की घटती जनशक्ति को देखते हुए रणनीतिक रूप से अहम है। दुबई बेस एक्सपर्ट साहिल मेनन का कहना है कि पुतिन की हालिया यात्रा पारंपरिक रक्षा सहयोग से आगे बढ़कर श्रमिकों के मुद्दों पर केंद्रित थी। यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस भारत से श्रमिकों को आकर्षित कर रहा है, लेकिन भारतीय मजदूरों की बड़ी संख्या भी रूस की पूरी लेबर समस्या को हल नहीं कर पाएगी।
रूसी सरकार ने विदेशी श्रमिकों के लिए अपने कोटे का एक तिहाई, यानी 71,817 स्लॉट, भारतीय नागरिकों के लिए आरक्षित कर दिए हैं। इसके बावजूद रूस में कामगारों की कमी बनी रहेगी। वहीं भारत भी अपने अतिरिक्त युवाओं को उन देशों में भेजने के लिए उत्सुक है, जो जनशक्ति की कमी से जूझ रहे हैं। यह कदम घरेलू रोजगार सृजन के बजाय वैकल्पिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
भारतीय श्रमिकों की चिंताएं
रूस जाने वाले भारतीयों के सामने कई गंभीर चुनौतियां भी हैं। कुछ लोग फर्जी भर्ती एजेंटों के झांसे में आकर रूसी सेना में शामिल होने के लिए मजबूर हुए। इसके अलावा, रूस जैसे अत्यधिक प्रतिबंध वाले देश में भविष्य की वित्तीय लाभप्रदता और जीवन सुरक्षा को लेकर भी संदेह बना हुआ है। जॉर्जिया और आर्मेनिया जैसे पड़ोसी देशों ने अपने नागरिकों को रूस की यात्रा करने से चेतावनी दी है।
मनी ट्रांसफर की समस्या
रूस का सबसे बड़ा ऋणदाता वीटीबी बैंक भारत में सक्रिय है और भारतीय श्रमिकों को मॉस्को में सुरक्षित रूप से पैसे भेजने के लिए इसका इस्तेमाल करना होगा। भारत से 20 लाख तक मजदूर रूस में होंगे, जिससे दिल्ली और मॉस्को के बीच एक नई निर्भरता बन सकती है।
विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि भारत से मजदूर भेजकर रूस की लेबर संकट को आंशिक रूप से ही हल किया जा सकता है और इसके साथ ही भारत के लिए भी कई आर्थिक और सुरक्षा संबंधी चिंताएं बनी रहेंगी।