
पटना: इस मकर संक्रांति पटना के सियासी गलियारों में खास माहौल रहेगा। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के चिर-परिचित अंदाज—“अरे दही लाओ, उधर चूड़ा नहीं है”—का अनुभव उनके बड़े बेटे और पूर्व मंत्री तेज प्रताप यादव के दही-चूड़ा भोज में जीवंत होगा।
भोज में नए अंदाज की उम्मीद
तेज प्रताप यादव इस बार सिर्फ पारंपरिक दही-चूड़ा भोज ही नहीं देंगे, बल्कि राजनीतिक रसूख का इजहार भी करेंगे। यह भोज उनके राजनीतिक कद को बढ़ाने और सियासी कार्यकर्ताओं में उत्साह जगाने का अवसर होगा। पिछले भोज की तरह इस बार भी वे नए अंदाज में नजर आ सकते हैं। वर्ष 2021 में उन्होंने दही-चूड़ा भोज के दौरान घुड़सवारी कर मीडिया का ध्यान आकर्षित किया था। इस बार भी भोज में संगीत कार्यक्रम और गायकों का जमावड़ा हो सकता है।
सामाजिक और राजनीतिक समरसता का संदेश
तेज प्रताप यादव इस अवसर पर राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, नेता प्रतिपक्ष और छोटे भाई तेजस्वी यादव सहित कई राजनीतिक दिग्गजों को आमंत्रित करेंगे। यह भोज केवल पारिवारिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक समरसता का भी प्रतीक होगा।
राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन
मकर संक्रांति के इस भोज को तेज प्रताप यादव अपने राजनीतिक कद और कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ाने का अवसर बनाएंगे। मीडिया और राजनीतिक जगत इस बात पर नजर रखेंगे कि भोज में कौन शामिल होता है और कौन नहीं। यही मूल्यांकन उनके राजनीतिक प्रभाव को परखने का माध्यम बनेगा।
आगे की राजनीति के लिए आत्ममूल्यांकन
बिहार विधानसभा 2025 की हार के बाद तेज प्रताप यादव के लिए यह भोज स्वयं का राजनीतिक मूल्यांकन करने का अवसर भी है। इसके आधार पर वह आगे की रणनीति तय करेंगे।
निष्कर्ष
इस मकर संक्रांति पटना में दही-चूड़ा भोज सिर्फ पारंपरिक पर्व नहीं रहेगा, बल्कि तेज प्रताप यादव के राजनीतिक संदेश और सियासी ताकत का प्रदर्शन भी होगा।