Thursday, January 8

बिहार की राजनीति में अकेली महिला का दबदबा: लवली आनंद ने राजपूत समाज में बनाया नया महल

 

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बिहार की राजनीति में राजपूत समाज का हमेशा से विशेष स्थान रहा है। परंपरागत रूप से इस समाज के बड़े नेता जैसे राजीव प्रताप रूडी, राधा मोहन सिंह, उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह और जगदानंद सिंह दशकों तक इसे संभालते आए हैं। लेकिन वर्तमान में शिवहर की सांसद लवली आनंद की सक्रियता और लोकप्रियता इन दिग्गजों पर भारी पड़ती दिख रही है।

 

लवली आनंद ने न केवल अपने निर्वाचन क्षेत्र में बल्कि पूरे राज्य में राजपूत वोट बैंक पर मजबूती से पकड़ बनाई है। उनके बेटे चेतन आनंद के नबीनगर से विधायक बनने और जेडीयू में आनंद मोहन परिवार की सियासी पकड़ ने उन्हें राजपूत राजनीति का प्रमुख चेहरा बना दिया है।

 

राजपूत समाज में बढ़ती सक्रियता और पहचान

बिहार सरकार की 2023 की जाति आधारित गणना के मुताबिक, राज्य में ब्राह्मणों के बाद राजपूत समाज की आबादी सबसे ज्यादा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में 12 सवर्ण सांसदों में से 6 राजपूत समाज से हैं। वहीं, 2025 बिहार विधानसभा चुनाव में कुल 72 सवर्ण विधायक चुने गए, जिनमें अकेले राजपूत समाज से 32 विधायक हैं। ऐसे में लवली आनंद का यह उभार और मजबूत पकड़ अन्य दिग्गज नेताओं के लिए चुनौती बनती जा रही है।

 

दिग्गज चेहरे भी महसूस कर रहे दबाव

सारण के राजीव प्रताप रूडी, मोतिहारी के राधा मोहन सिंह, राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह और पूर्णिया के पूर्व सांसद उदय सिंह जैसे नेता दशकों से राजपूत राजनीति में अपना प्रभाव रखते आए हैं। लेकिन लवली आनंद की बढ़ती लोकप्रियता और नई शैली ने उन्हें अब राजनीतिक दबाव का सामना करने पर मजबूर कर दिया है।

 

लवली आनंद: नई पीढ़ी और पुराने समर्थकों के बीच सेतु

लवली आनंद ने साबित कर दिया है कि वे न केवल आनंद मोहन सिंह के करिश्मा को आगे बढ़ा रही हैं, बल्कि राजपूत समाज के हर वर्ग तक पहुंच बनाने में सक्षम हैं। उनके भाषण, रैलियों में उपस्थिति और चुनावी सक्रियता ने उन्हें राजपूत समुदाय का प्रमुख नेतृत्व बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले विधानसभा चुनावों में लवली आनंद का प्रभाव इस समाज के वोट बैंक को साधने में निर्णायक साबित होगा।

 

निष्कर्ष:

जहां पुराने नेता अपनी पारंपरिक राजनीति तक सीमित दिख रहे हैं, वहीं लवली आनंद नए और पुराने समर्थकों के बीच सशक्त पुल का काम कर रही हैं। बिहार की राजनीति में राजपूत समाज के लिए उनका यह उभार अब ‘कास्ट सिंहासन’ पर नई हलचल पैदा कर रहा है।

 

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