
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकिंग सिस्टम में पारदर्शिता और बेहतर कॉरपोरेट गवर्नेंस सुनिश्चित करने के लिए लोन से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव किया है। नए दिशा-निर्देशों के तहत अब बैंक अपने प्रमोटरों, उनके रिश्तेदारों और 10% या उससे अधिक हिस्सेदारी रखने वाले शेयरधारकों को लोन नहीं दे सकेंगे। यही नहीं, जिन कंपनियों पर इन लोगों का नियंत्रण या प्रभाव है, उन्हें भी बैंक से कर्ज नहीं मिलेगा। ये नियम 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे।
क्यों किया गया बदलाव
RBI के मुताबिक, इन सख्त नियमों का उद्देश्य हितों के टकराव (Conflict of Interest) को रोकना, बैंकों की निगरानी व्यवस्था मजबूत करना और अनैतिक लोन देने की संभावनाओं पर लगाम लगाना है। हालांकि, RBI ने स्पष्ट किया है कि शेयरों में निवेश को इन नियमों से बाहर रखा गया है। लेकिन अगर बैंक अपने प्रमोटरों या उनसे जुड़ी इकाइयों के डेट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करते हैं, तो वह इन नियमों के दायरे में आएगा।
बोर्ड की मंजूरी और सख्त निगरानी
नए नियमों के तहत बैंकों को बोर्ड से मंजूरी प्राप्त ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जिनमें यह स्पष्ट होगा कि रिलेटेड पार्टियों को लोन देने की प्रक्रिया क्या होगी और उसकी अधिकतम सीमा कितनी होगी। साथ ही, किसी भी गलत या अनैतिक लोन की जानकारी देने के लिए एक प्रभावी रिपोर्टिंग सिस्टम भी बनाना अनिवार्य होगा।
यदि किसी लोन में बैंक के डायरेक्टर, वरिष्ठ अधिकारी या किसी खास कर्मचारी का हित जुड़ा है, तो उन्हें उस फैसले से खुद को अलग रखना होगा।
लोन राशि की सीमा तय
अगर रिलेटेड पार्टी को दिया जाने वाला लोन तय सीमा से अधिक है, तो उसके लिए बोर्ड या विशेष समिति की मंजूरी जरूरी होगी।
- बड़े बैंकों के लिए: ₹25 करोड़
- मध्यम आकार के बैंकों के लिए: ₹10 करोड़
- छोटे बैंकों के लिए: ₹5 करोड़
इसके अलावा, बैंकों को अपने प्रमोटरों, बड़े शेयरधारकों और उनसे जुड़ी सभी इकाइयों की अपडेटेड सूची रखनी होगी। नियमों के पालन की हर तीन महीने में समीक्षा करनी होगी और किसी भी गड़बड़ी की सूचना ऑडिट कमेटी को देनी होगी। विशेष कर्मचारियों को दिए गए लोन की जानकारी हर साल सार्वजनिक करनी होगी।
किन मामलों में मिलेगी छूट
अगर किसी कंपनी में केवल निवेश किया गया है और उस पर प्रमोटर या शेयरधारक का नियंत्रण नहीं है, तो ऐसे मामलों में छूट दी जा सकती है। लिस्टेड बैंकों को सेबी के नियमों और RBI के ग्रुप के भीतर लोन सीमा से जुड़े दिशा-निर्देशों का भी पालन करना होगा।
पुराने लोन और सजा का प्रावधान
जो पुराने लोन या लेन-देन इन नए नियमों के अनुरूप नहीं हैं, वे अपनी अवधि पूरी होने तक जारी रहेंगे। RBI ने रिलेटेड पार्टी की परिभाषा में भी बदलाव किया है और शेयरहोल्डिंग के लिए पहले लागू ₹5 करोड़ की मौद्रिक सीमा को हटा दिया गया है।
हालांकि, नियमों का उल्लंघन करने पर RBI सख्त कार्रवाई कर सकता है। इसमें जुर्माना, अतिरिक्त प्रोविजनिंग, फोरेंसिक ऑडिट और बैंक के कारोबार पर रोक जैसे कदम शामिल हैं।
विशेष रूप से, ग्रामीण सहकारी बैंकों के डायरेक्टरों को मिलने वाले कृषि और उससे जुड़े लोन पर पहले से लागू कानूनी प्रतिबंध यथावत रहेंगे। RBI का यह कदम बैंकिंग सेक्टर में अनुशासन और भरोसे को मजबूत करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।