Tuesday, August 11

Opinion

जब नारों में गालियाँ उतर आएँ
Opinion

जब नारों में गालियाँ उतर आएँ

लोकतंत्र की असली ताकत संवाद है, अपमान नहीं लेखिका : डॉ. प्रियंका सौरभ (सद्वार्ता) लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह असहमति को स्थान देता है। प्रश्न पूछना, सत्ता से जवाब मांगना और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना एक जागरूक नागरिक का अधिकार ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला भी है। लेकिन जब विरोध की भाषा में विचारों की जगह गालियाँ और तर्कों की जगह अपमान आ जाता है, तब लोकतंत्र की मूल भावना आहत होने लगती है। नारे किसी भी आंदोलन की पहचान होते हैं। वे केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि उस आंदोलन के विचार, उद्देश्य और दिशा का प्रतीक होते हैं। इतिहास में "इंकलाब ज़िंदाबाद", "करो या मरो" और "जय जवान, जय किसान" जैसे नारे इसलिए अमर हुए क्योंकि उनमें किसी व्यक्ति के प्रति अपमान नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए सकारात्मक संदेश था। आज सोशल मीडिया के दौर में तीखी और उत्तेजक भ...
नीट के बवाल के बीच एक बड़ा सवाल: डॉक्टर बनने की राह में संवेदनाएँ कहाँ खो जाती हैं?
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नीट के बवाल के बीच एक बड़ा सवाल: डॉक्टर बनने की राह में संवेदनाएँ कहाँ खो जाती हैं?

- डॉ. सत्यवान सौरभ देश में जब भी नीट (NEET) परीक्षा होती है, उसके बाद केवल परिणामों की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की चर्चा शुरू हो जाती है। कभी पेपर लीक, कभी परीक्षा की पारदर्शिता, कभी आरक्षण, कभी कट-ऑफ और कभी लाखों विद्यार्थियों पर पड़ने वाले मानसिक दबाव को लेकर बहस छिड़ जाती है। हर वर्ष करोड़ों सपनों का भार इस एक परीक्षा पर टिका होता है। माता-पिता अपनी वर्षों की बचत दाँव पर लगा देते हैं, विद्यार्थी दिन-रात एक कर देते हैं और समाज उन सफल अभ्यर्थियों को भविष्य का जीवनरक्षक मानकर गर्व महसूस करता है। लेकिन इन तमाम बहसों के बीच एक ऐसा प्रश्न है, जो शायद सबसे महत्वपूर्ण है, फिर भी सबसे कम पूछा जाता है। आखिर यही बच्चे, जो डॉक्टर बनने का सपना लेकर मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश करते हैं, उनमें से कुछ आगे चलकर ऐसे डॉक्टर क्यों बन जाते हैं जिनके व्यवहार को लेकर समाज में असंतोष दिखाई देता है? क्यों ...
क्या एलबीएसएनएए अब प्रशिक्षण अकादमी नहीं, विवाह ब्यूरो है?
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क्या एलबीएसएनएए अब प्रशिक्षण अकादमी नहीं, विवाह ब्यूरो है?

क्या बैचमेट से विवाह लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी की पहचान बन सकता है? — डॉ. प्रियंका सौरभ सोशल मीडिया के दौर में किसी भी संस्थान, व्यक्ति या घटना के बारे में राय बनाना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो गया है। एक वायरल पोस्ट, कुछ तस्वीरें या कुछ व्यक्तिगत घटनाएँ देखते ही पूरे संस्थान की छवि गढ़ दी जाती है। हाल के दिनों में लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA) को लेकर भी ऐसा ही विमर्श देखने को मिला। प्रश्न उठाया गया कि क्या यह प्रतिष्ठित प्रशिक्षण संस्थान अब "विवाह ब्यूरो" बन गया है? कुछ लोगों ने इसे "स्वयंवर" तक कह दिया। पहली नज़र में यह केवल व्यंग्य या मज़ाक लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह टिप्पणी देश की सर्वोच्च प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्था की गरिमा, वहां प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे अधिकारी प्रशिक्षुओं की पेशेवर निष्ठा और उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता—तीन...
खातिर कुर्सी के लिए, करते नित प्रपंच।
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खातिर कुर्सी के लिए, करते नित प्रपंच।

खातिर कुर्सी के लिए, करते नित प्रपंच। राष्ट्रहित को भूलकर, साधें केवल मंच॥ सत्ता पाने के लिए, रचें नए षड्यंत्र। देश-विरोधी शक्तियाँ, फूँक रहीं विष-मंत्र॥ लोभ-मोह की आग में, जलता आज विवेक। कुर्सी खातिर बेचते, राष्ट्रधर्म अनेक॥ देश-विरोधी सोच का, करते जो विस्तार। जन-जन उनको दे रहा, अब खुलकर ललकार॥ कुर्सी जिनका लक्ष्य है, नीति गई सब भूल। स्वार्थों की इस धूप में, झुलस रहे उसूल॥ राष्ट्र प्रथम जिनके लिए, उनका ऊँचा मान। कुर्सी हित जो बिक गए, खो बैठे सम्मान॥ खातिर कुर्सी के लिए, बोएँ वैर-विवाद। भारत फिर भी जोड़ता, प्रेम, शांति, संवाद॥ झूठ, प्रपंच, षड्यंत्र से, कब मिलता सम्मान। सत्य, नीति, सद्भाव से, ऊँचा हो इंसान॥ — डॉ. प्रियंका सौरभ   (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)...
देश विरोधी शक्तियाँ, फूँक रहीं विष-मंत्र॥
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देश विरोधी शक्तियाँ, फूँक रहीं विष-मंत्र॥

सत्ता पाने के लिए, रचें नए षड्यंत्र।देश विरोधी शक्तियाँ, फूँक रहीं विष-मंत्र॥ झूठ-फरेबी जाल में, उलझा सारा देश।स्वार्थों की इस आग ने, बदला जन-परिवेश॥आवाज़ सत्य की दबी, बढ़ा कपट का तंत्र—देश विरोधी शक्तियाँ, फूँक रहीं विष-मंत्र॥ जाति-धर्म के नाम पर, बाँटें घर-परिवार।नफ़रत की खेती करें, भूल प्रेम-व्यवहार॥टूट न जाए एकता, यही समय का मंत्र—देश विरोधी शक्तियाँ, फूँक रहीं विष-मंत्र॥ कुर्सी की खातिर यहाँ, बदल रहे सब पार्थ।जनहित पीछे रह गया, आगे केवल स्वार्थ॥लोकतंत्र पर हो रहा, छल-कपट का तंत्र—देश विरोधी शक्तियाँ, फूँक रहीं विष-मंत्र॥ जागो भारत के जनो, पहचानो षड्यंत्र।सत्य, विवेक, साहस से, तोड़ो हर कुतंत्र॥राष्ट्रभक्ति की ज्योति से, होगा शुभ परिवर्तन—देश विरोधी शक्तियाँ, फूँक रहीं विष-मंत्र॥ 'सौरभ' जब जन एक हों, विफल सभी षड्यंत्र।सत्य, प्रेम, सद्भाव से, टूटे हर विष-मंत्र॥भारत लिए अखं...
छात्र आंदोलन: मुद्दों से भटकती बहस और भविष्य की चिंता
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छात्र आंदोलन: मुद्दों से भटकती बहस और भविष्य की चिंता

— डॉ. सत्यवान सौरभ (सद्वार्ता) लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन केवल अधिकार नहीं, बल्कि जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक प्रभावी माध्यम भी है। जब व्यवस्था में कोई गंभीर खामी सामने आती है, तब जनता अपनी आवाज़ बुलंद करती है और सरकार से जवाब मांगती है। विशेष रूप से जब मामला लाखों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा हो, तब विरोध का स्वर और अधिक स्वाभाविक हो जाता है। NEET जैसी राष्ट्रीय परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक की खबरों ने पूरे देश के युवाओं और उनके अभिभावकों को चिंतित किया। वर्षों की कठिन मेहनत के बाद यदि किसी परीक्षा की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग जाए, तो आक्रोश पैदा होना असामान्य नहीं है। किंतु इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा प्रश्न भी खड़ा किया कि क्या छात्र आंदोलनों का उद्देश्य वास्तव में छात्रों का भविष्य रह गया है, या फिर वे धीरे-धीरे राजनीतिक और वैचारिक संघर्षों का मंच बनते जा रहे ह...
देश का विश्वास
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देश का विश्वास

भारत माँ की पीर का, किसको है अब ख्याल। देश बनाने आ गए, डाकू, नटवरलाल॥ सत्ता इनके हाथ से, फिसली जिस दिन आज। मिलकर फिर से ढूँढ़ते, छल-कपटों का राज। धरना, नारे, शोर से, करते रोज़ बवाल— भारत माँ को हो रहा, इसका बहुत मलाल। देश बनाने आ गए, डाकू, नटवरलाल॥ धरना देकर ढूँढ़ते, फिर सत्ता की राह। जनता से ज़्यादा उन्हें, कुर्सी की है चाह॥ जनता देखे मौन हो, कैसा यह जंजाल— भारत माँ को हो रहा, इसका बहुत मलाल। देश बनाने आ गए, डाकू, नटवरलाल॥ लिए विदेशी धन सदा, करते जो अभियान। उनसे पूछे देश अब, क्या यह है सम्मान? हर जनमन के सामने, खड़ा यही सवाल— भारत माँ को हो रहा, इसका बहुत मलाल। देश बनाने आ गए, डाकू, नटवरलाल॥ भारत होगा एक दिन, फिर से अति खुशहाल। सद्भावों की जल उठे, घर-घर नई मशाल। देश बड़ा हर धर्म से, ऊँचा इसका भाल— स्वार्थ नहीं, सद्भाव से, मिलते ह...
चिट्ठियों का मान
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चिट्ठियों का मान

नन्हे-नन्हे हाथ में, चिट्ठियों का मान। ढूँढ़ रहा प्रज्ञान है, बीते कल की शान॥ कागज़-कागज़ बोलते, जीवन के आधार। संघर्षों की रोशनी, मिली आज उपहार॥ शब्द नहीं बस पत्र ये, सपनों का संसार। हर अक्षर में बस रहा, जीवन का विस्तार॥ सम्मानों की गंध है, रिश्तों की मिठास। साधना के हर कदम, लिखते नया इतिहास॥ पापा की हर चिट्ठियाँ, अनुभव का भंडार। नन्हा मन उत्सुक बना, जाने उनका सार॥ बीते वर्षों की धरोहर, स्नेह भरे उपहार। पढ़-पढ़कर प्रज्ञान ने, जोड़े नए विचार॥ कल जिसने इतिहास रचा, आज वही पहचान। अगली पीढ़ी सीखती, उसका हर अभियान॥ - डॉ. सत्यवान सौरभ (डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)...
भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन शुरू, लेकिन मंजिल सिर्फ रेलवे नहीं बल्कि भविष्य की ऊर्जा क्रांति
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भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन शुरू, लेकिन मंजिल सिर्फ रेलवे नहीं बल्कि भविष्य की ऊर्जा क्रांति

नई दिल्ली। (सद्वार्ता) भारत ने परिवहन और स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में एक नया कदम बढ़ाते हुए अपनी पहली हाइड्रोजन ट्रेन शुरू कर दी है। हरियाणा के जींद–सोनीपत रेलखंड (करीब 90 किलोमीटर) पर शुरू हुई यह ट्रेन केवल एक नई रेल सेवा नहीं, बल्कि भारत के ग्रीन हाइड्रोजन मिशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग मानी जा रही है। पहली नजर में यह सवाल उठता है कि जब भारतीय रेलवे का लगभग पूरा ब्रॉडगेज नेटवर्क पहले ही विद्युतीकृत हो चुका है, तो फिर हाइड्रोजन ट्रेन की जरूरत क्यों पड़ी? इसका जवाब केवल डीजल को हटाना नहीं है, बल्कि भारत में हाइड्रोजन तकनीक का एक मजबूत इकोसिस्टम तैयार करना है। कैसे काम करती है हाइड्रोजन ट्रेन? हाइड्रोजन ट्रेन में डीजल इंजन का इस्तेमाल नहीं होता। इसके ऊपर लगे विशेष टैंकों में हाइड्रोजन गैस भरी जाती है। यह हाइड्रोजन फ्यूल सेल में हवा की ऑक्सीजन के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया करती ...
हर प्रभात कहता
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हर प्रभात कहता

सद्वार्ता क्षितिज सुनाता रोज़ ही, आशा का संदेश। हर प्रभात कहता उठो, जीवन परम विशेष॥ सूरज चुपके से रचे, नव उजियारा-गान। रातों के हर दर्द का, करता है अवसान॥ लहर-लहर सागर कहे, छोड़ो बीता काल। आगे बढ़ना ही सदा, जीवन की है चाल॥ लाली ओढ़े व्योम ने, लिखा नया अध्याय। अँधियारे के अश्रु से, जन्मा नव पर्याय॥ रेतों के पदचिह्न भी, देते यही पुकार। चलते रहने से सदा, मिलता है संसार॥ थका हुआ हर मन यहाँ, पाए फिर विश्वास। नव किरणों के साथ ही, खिल उठती हर आस॥ कल की हारों का नहीं, रखता सूरज लेख। हर दिन देता रोशनी, मिटा निराशा-रेख॥ भीतर जितना दीप हो, उतना जग उजियार। मन का निर्मल आलोक ही, जीवन का आधार॥ 'सौरभ' हर प्रभात में, ईश्वर का वरदान। उठो, बढ़ो, मुस्काइए, यह जीवन का गान॥ — डॉ. प्रियंका सौरभ   (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित...