

— डॉ. सत्यवान सौरभ (सद्वार्ता)

लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन केवल अधिकार नहीं, बल्कि जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक प्रभावी माध्यम भी है। जब व्यवस्था में कोई गंभीर खामी सामने आती है, तब जनता अपनी आवाज़ बुलंद करती है और सरकार से जवाब मांगती है। विशेष रूप से जब मामला लाखों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा हो, तब विरोध का स्वर और अधिक स्वाभाविक हो जाता है। NEET जैसी राष्ट्रीय परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक की खबरों ने पूरे देश के युवाओं और उनके अभिभावकों को चिंतित किया। वर्षों की कठिन मेहनत के बाद यदि किसी परीक्षा की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग जाए, तो आक्रोश पैदा होना असामान्य नहीं है। किंतु इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा प्रश्न भी खड़ा किया कि क्या छात्र आंदोलनों का उद्देश्य वास्तव में छात्रों का भविष्य रह गया है, या फिर वे धीरे-धीरे राजनीतिक और वैचारिक संघर्षों का मंच बनते जा रहे हैं?
किसी भी छात्र आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसकी नैतिकता होती है। जब छात्र अपने अधिकारों और भविष्य के लिए संघर्ष करते हैं, तब समाज उनके साथ खड़ा होता है। अभिभावक, शिक्षक और आम नागरिक भी उनकी मांगों को उचित मानते हैं। लेकिन जैसे ही आंदोलन का केंद्र बदलने लगता है और मूल मुद्दे से असंबंधित विषय मंच पर आने लगते हैं, तब उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। यदि परीक्षा में गड़बड़ी के विरोध का मंच ऐसे नारों, भाषणों या विवादों का केंद्र बन जाए जिनका शिक्षा व्यवस्था से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, तो आंदोलन की गंभीरता कम होती है और वास्तविक मुद्दा पीछे छूट जाता है।
आज देश का युवा पेपर लीक से परेशान है। उसे इस बात की चिंता है कि वर्षों की मेहनत कहीं किसी अपराधी गिरोह की वजह से व्यर्थ न चली जाए। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह होना चाहिए कि पेपर लीक कैसे रुकेंगे, परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित कैसे बनाया जाएगा, दोषियों को कितनी जल्दी और कितनी कठोर सजा मिलेगी तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कौन-से संस्थागत सुधार किए जाएंगे। यदि इन मूल प्रश्नों के स्थान पर केवल राजनीतिक नारे और सरकार विरोध या सरकार समर्थन की बहस प्रमुख हो जाए, तो समाधान की दिशा कमजोर पड़ जाती है।
यह भी स्वीकार करना होगा कि पेपर लीक कोई नई समस्या नहीं है। अलग-अलग राज्यों में, अलग-अलग सरकारों के समय विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं के मामले सामने आते रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि समस्या किसी एक दल, एक मंत्री या एक सरकार तक सीमित नहीं है। समस्या उस तंत्र में है जिसमें अपराधी गिरोह सेंध लगाने में सफल हो जाते हैं। इसलिए यदि हर बार केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक ही चर्चा सीमित रहेगी, तो वास्तविक अपराधी बच निकलेंगे और विद्यार्थी बार-बार पीड़ित होंगे।
किसी मंत्री का इस्तीफा लोकतांत्रिक जवाबदेही का विषय हो सकता है, लेकिन यह अपने आप में अंतिम समाधान नहीं है। मंत्री बदलने से व्यवस्था तभी बदलेगी जब प्रशासनिक सुधार, तकनीकी सुरक्षा, पारदर्शी जांच और कठोर दंड व्यवस्था लागू होगी। यदि जड़ पर प्रहार नहीं होगा तो केवल चेहरे बदलने से परिणाम नहीं बदलेंगे। इसलिए छात्र आंदोलनों का केंद्र व्यक्ति नहीं, व्यवस्था में सुधार होना चाहिए।
सोशल मीडिया के दौर में आंदोलनों की दिशा बहुत तेजी से बदलती है। कुछ सेकंड की वीडियो क्लिप, एक नारा या एक पोस्ट पूरे आंदोलन की छवि तय कर देती है। यही कारण है कि आंदोलन से जुड़े लोगों की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है। यदि मंच पर ऐसे नारे सुनाई दें जिनका परीक्षा या शिक्षा से कोई संबंध न हो, तो आम नागरिक यह सोचने पर विवश हो जाता है कि क्या आंदोलन का मूल उद्देश्य वही है जो शुरुआत में बताया गया था। लोकतंत्र में विचारधाराओं का स्थान है, लेकिन जब छात्र आंदोलन वैचारिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम बन जाए, तब सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं छात्रों का होता है जिनके नाम पर आंदोलन शुरू हुआ था।
सार्वजनिक जीवन में सक्रिय किसी भी व्यक्ति—चाहे वह सामाजिक कार्यकर्ता हो, छात्र नेता हो या आंदोलन का चेहरा—उसकी बातों से सहमति और असहमति दोनों हो सकती हैं। लोकतंत्र इसी विविधता का नाम है। लेकिन किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन व्यक्तियों की लोकप्रियता से नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य और परिणामों से होना चाहिए। यदि आंदोलन छात्रों के भविष्य के लिए शुरू हुआ है, तो उसकी हर गतिविधि, हर नारा और हर मांग उसी उद्देश्य को मजबूत करने वाली होनी चाहिए। अन्यथा समाज का विश्वास कमजोर पड़ने लगता है।
आज आवश्यकता केवल दोषारोपण की नहीं, बल्कि व्यापक सुधार की है। राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं के लिए अत्याधुनिक डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था विकसित करनी होगी। प्रश्नपत्रों के निर्माण से लेकर वितरण तक हर चरण में जवाबदेही तय करनी होगी। साइबर सुरक्षा को मजबूत करना होगा। पेपर लीक में शामिल संगठित गिरोहों की संपत्ति जब्त करने, त्वरित न्याय और आजीवन प्रतिबंध जैसे कठोर उपायों पर गंभीरता से विचार करना होगा। जब तक अपराधियों को यह भय नहीं होगा कि उनके अपराध की कीमत बहुत भारी होगी, तब तक समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं होगी।
राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। सत्ता पक्ष को आलोचना से बचने के बजाय पारदर्शी कार्रवाई करनी चाहिए, जबकि विपक्ष को केवल सरकार की आलोचना तक सीमित रहने के बजाय रचनात्मक सुझाव भी देने चाहिए। यदि हर समस्या केवल राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखी जाएगी, तो छात्रों का विश्वास लोकतांत्रिक संस्थाओं से कम होता जाएगा। शिक्षा और युवाओं का भविष्य किसी भी राजनीतिक लाभ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण विषय है।
समाज को भी आत्ममंथन करना होगा। कई बार हम सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो, अधूरी सूचनाओं या भावनात्मक संदेशों के आधार पर तुरंत पक्ष-विपक्ष तय कर लेते हैं। जबकि किसी भी आंदोलन या विवाद का मूल्यांकन तथ्यों, प्रमाणों और संतुलित दृष्टिकोण से होना चाहिए। लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, लेकिन असहमति तभी सार्थक होती है जब वह विवेक और जिम्मेदारी के साथ व्यक्त की जाए।
छात्रों को भी यह समझना होगा कि उनकी सबसे बड़ी शक्ति उनकी नैतिक विश्वसनीयता है। यदि वे अपने मुद्दों पर एकजुट रहेंगे, तो पूरा समाज उनके साथ खड़ा होगा। लेकिन यदि उनका आंदोलन राजनीतिक ध्रुवीकरण का माध्यम बन जाएगा, तो उनकी वास्तविक मांगें पीछे छूट जाएँगी। इतिहास गवाह है कि सफल जनांदोलन वही रहे हैं जिन्होंने अपने मूल उद्देश्य को कभी नहीं छोड़ा।
भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में है। यह जनसंख्या हमारी सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी। यदि युवाओं का विश्वास परीक्षा प्रणाली, शिक्षा व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं से डगमगाने लगे, तो उसका प्रभाव केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे राष्ट्र के भविष्य पर पड़ेगा। इसलिए पेपर लीक जैसी घटनाओं को केवल समाचार या राजनीतिक विवाद मानकर छोड़ देना उचित नहीं होगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, न्यायपालिका, जांच एजेंसियाँ, शैक्षणिक संस्थान, अभिभावक, शिक्षक और छात्र—सभी मिलकर ऐसी व्यवस्था तैयार करें जिसमें मेहनत का सम्मान हो, प्रतिभा को अवसर मिले और किसी भी छात्र को यह भय न रहे कि उसकी सफलता किसी अपराधी गिरोह की वजह से छिन सकती है।
लोकतंत्र में आंदोलन आवश्यक हैं, लेकिन आंदोलन तभी प्रभावी होते हैं जब वे अपने मूल उद्देश्य से न भटकें। यदि लक्ष्य छात्रों का भविष्य है, तो बहस भी उसी पर केंद्रित रहनी चाहिए। व्यक्ति आएँगे-जाएँगे, सरकारें बदलेंगी, राजनीतिक दल सत्ता में आएँगे और जाएंगे, लेकिन भारत का भविष्य आज का विद्यार्थी ही तय करेगा। इसलिए छात्र आंदोलनों को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का नहीं, बल्कि शिक्षा सुधार और पारदर्शी व्यवस्था का माध्यम बनाना ही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)


