

सत्ता पाने के लिए, रचें नए षड्यंत्र।
देश विरोधी शक्तियाँ, फूँक रहीं विष-मंत्र॥

झूठ-फरेबी जाल में, उलझा सारा देश।
स्वार्थों की इस आग ने, बदला जन-परिवेश॥
आवाज़ सत्य की दबी, बढ़ा कपट का तंत्र—
देश विरोधी शक्तियाँ, फूँक रहीं विष-मंत्र॥
जाति-धर्म के नाम पर, बाँटें घर-परिवार।
नफ़रत की खेती करें, भूल प्रेम-व्यवहार॥
टूट न जाए एकता, यही समय का मंत्र—
देश विरोधी शक्तियाँ, फूँक रहीं विष-मंत्र॥
कुर्सी की खातिर यहाँ, बदल रहे सब पार्थ।
जनहित पीछे रह गया, आगे केवल स्वार्थ॥
लोकतंत्र पर हो रहा, छल-कपट का तंत्र—
देश विरोधी शक्तियाँ, फूँक रहीं विष-मंत्र॥
जागो भारत के जनो, पहचानो षड्यंत्र।
सत्य, विवेक, साहस से, तोड़ो हर कुतंत्र॥
राष्ट्रभक्ति की ज्योति से, होगा शुभ परिवर्तन—
देश विरोधी शक्तियाँ, फूँक रहीं विष-मंत्र॥
‘सौरभ’ जब जन एक हों, विफल सभी षड्यंत्र।
सत्य, प्रेम, सद्भाव से, टूटे हर विष-मंत्र॥
भारत लिए अखंडता, फलता रहे स्वतंत्र—
सत्ता पाने के लिए, रचें नए षड्यंत्र।
देश विरोधी शक्तियाँ, फूँक रहीं विष-मंत्र॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)


