Wednesday, August 12

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खातिर कुर्सी के लिए, करते नित प्रपंच।

खातिर कुर्सी के लिए, करते नित प्रपंच।

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राष्ट्रहित को भूलकर, साधें केवल मंच॥

सत्ता पाने के लिए, रचें नए षड्यंत्र।

देश-विरोधी शक्तियाँ, फूँक रहीं विष-मंत्र॥

लोभ-मोह की आग में, जलता आज विवेक।

कुर्सी खातिर बेचते, राष्ट्रधर्म अनेक॥

देश-विरोधी सोच का, करते जो विस्तार।

जन-जन उनको दे रहा, अब खुलकर ललकार॥

कुर्सी जिनका लक्ष्य है, नीति गई सब भूल।

स्वार्थों की इस धूप में, झुलस रहे उसूल॥

राष्ट्र प्रथम जिनके लिए, उनका ऊँचा मान।

कुर्सी हित जो बिक गए, खो बैठे सम्मान॥

खातिर कुर्सी के लिए, बोएँ वैर-विवाद।

भारत फिर भी जोड़ता, प्रेम, शांति, संवाद॥

झूठ, प्रपंच, षड्यंत्र से, कब मिलता सम्मान।

सत्य, नीति, सद्भाव से, ऊँचा हो इंसान॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ

  (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

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