

क्या बैचमेट से विवाह लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी की पहचान बन सकता है?

— डॉ. प्रियंका सौरभ
सोशल मीडिया के दौर में किसी भी संस्थान, व्यक्ति या घटना के बारे में राय बनाना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो गया है। एक वायरल पोस्ट, कुछ तस्वीरें या कुछ व्यक्तिगत घटनाएँ देखते ही पूरे संस्थान की छवि गढ़ दी जाती है। हाल के दिनों में लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA) को लेकर भी ऐसा ही विमर्श देखने को मिला। प्रश्न उठाया गया कि क्या यह प्रतिष्ठित प्रशिक्षण संस्थान अब “विवाह ब्यूरो” बन गया है? कुछ लोगों ने इसे “स्वयंवर” तक कह दिया। पहली नज़र में यह केवल व्यंग्य या मज़ाक लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह टिप्पणी देश की सर्वोच्च प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्था की गरिमा, वहां प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे अधिकारी प्रशिक्षुओं की पेशेवर निष्ठा और उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता—तीनों पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
यह प्रश्न केवल एलबीएसएनएए तक सीमित नहीं है। यह हमारे समाज की उस मानसिकता को भी उजागर करता है, जो किसी भी संस्थान में स्त्री और पुरुष की सामान्य मित्रता को सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पाती। यदि किसी बैच में कुछ अधिकारी एक-दूसरे को समझते हुए विवाह का निर्णय लेते हैं, तो क्या इससे पूरे संस्थान की पहचान बदल जाती है? निश्चित रूप से नहीं।
एलबीएसएनएए कोई साधारण परिसर नहीं, बल्कि भारत की प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे प्रतिष्ठित प्रशिक्षण अकादमी है। यहां भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) सहित भारतीय पुलिस सेवा (IPS), भारतीय विदेश सेवा (IFS) और अन्य केंद्रीय सेवाओं के अधिकारी प्रशिक्षित होते हैं। यह प्रशिक्षण केवल किताबों और व्याख्यानों तक सीमित नहीं रहता। इसमें भारत दर्शन, ट्रेकिंग, ग्राम भ्रमण, सामुदायिक जीवन, शारीरिक प्रशिक्षण, सांस्कृतिक कार्यक्रम, नीति-निर्माण अभ्यास, नेतृत्व विकास और संकट प्रबंधन जैसी अनेक गतिविधियाँ शामिल होती हैं। इनका उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि ऐसे प्रशासक तैयार करना है जो भारत की विविधता को समझ सकें और कठिन परिस्थितियों में भी संवेदनशील तथा प्रभावी निर्णय ले सकें।
जब देश के विभिन्न राज्यों, भाषाओं, संस्कृतियों और सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए युवा अधिकारी कई महीनों तक एक साथ रहते हैं, प्रशिक्षण लेते हैं, यात्राएँ करते हैं और चुनौतियों का सामना करते हैं, तो उनके बीच मित्रता का विकसित होना पूरी तरह स्वाभाविक है। यही मित्रता कई बार जीवनभर के रिश्ते में भी बदल सकती है। लेकिन यह व्यक्तिगत निर्णय होता है, न कि किसी संस्थान की संस्कृति या उद्देश्य का परिणाम।
यदि किसी विश्वविद्यालय, मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग संस्थान, प्रबंधन संस्थान, सेना की अकादमी या किसी निजी कंपनी में साथ पढ़ने या काम करने वाले दो लोग विवाह करते हैं, तो उस संस्थान को कोई विवाह ब्यूरो नहीं कहता। फिर एलबीएसएनएए के साथ ऐसा दृष्टिकोण क्यों अपनाया जाता है? इसका उत्तर हमारे सामाजिक पूर्वाग्रहों में छिपा है।
वास्तविकता यह है कि एलबीएसएनएए में आने वाले अनेक अधिकारी पहले से ही किसी रिश्ते में होते हैं। कई अपने बचपन के मित्र, कॉलेज के साथी या परिवार की पसंद से विवाह करते हैं। अनेक अधिकारी प्रशिक्षण पूरा होने के बाद भी अविवाहित रहते हैं। वहीं कुछ अधिकारी प्रशिक्षण के दौरान एक-दूसरे को बेहतर समझने के बाद विवाह का निर्णय लेते हैं। इन सभी परिस्थितियों में समान बात केवल एक है—निर्णय व्यक्ति का होता है, संस्थान का नहीं।
सोशल मीडिया अक्सर कुछ घटनाओं को सामान्य नियम की तरह प्रस्तुत कर देता है। यदि किसी बैच के दो अधिकारी विवाह करते हैं, तो उसे इस तरह प्रचारित किया जाता है मानो अकादमी का मुख्य उद्देश्य ही विवाह कराना हो। जबकि हजारों अधिकारी बिना किसी ऐसे संबंध के प्रशिक्षण पूरा कर देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। उनकी मेहनत, अनुशासन और प्रशासनिक योगदान पर चर्चा कम होती है, जबकि व्यक्तिगत जीवन सुर्खियाँ बन जाता है।
यह प्रवृत्ति विशेष रूप से महिला अधिकारियों के संदर्भ में और भी चिंताजनक हो जाती है। आज भी समाज का एक वर्ग पुरुष और महिला की पेशेवर मित्रता को संदेह की दृष्टि से देखता है। यदि वे साथ दिखाई दें, तो तुरंत प्रेम संबंधों की कल्पना कर ली जाती है। यह दृष्टिकोण न केवल महिलाओं की पेशेवर पहचान को कमजोर करता है, बल्कि कार्यस्थलों पर स्वस्थ सहयोग की संस्कृति को भी नुकसान पहुँचाता है। आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था में महिला और पुरुष अधिकारी समान भागीदार हैं। उनके बीच सहयोग, संवाद और सम्मान लोकतांत्रिक प्रशासन की आवश्यकता है, न कि किसी विवाद का विषय।
कुछ लोग यह भी मान लेते हैं कि एलबीएसएनएए में प्रशिक्षण के कारण पहले से बने रिश्ते टूट जाते हैं या जीवनसाथियों में असुरक्षा पैदा हो जाती है। यह धारणा भी तथ्यों से अधिक कल्पना पर आधारित है। किसी भी संबंध की सफलता विश्वास, संवाद और परस्पर सम्मान पर निर्भर करती है। यदि रिश्ता मजबूत है, तो कोई प्रशिक्षण संस्थान उसे कमजोर नहीं कर सकता। और यदि रिश्ता कमजोर है, तो उसका कारण किसी एक संस्थान को ठहराना उचित नहीं होगा।
यह भी समझना आवश्यक है कि अधिकारी प्रशिक्षु सबसे पहले नागरिक हैं। उन्हें भी मित्र बनाने, जीवनसाथी चुनने और निजी जीवन के निर्णय लेने का वही अधिकार है जो संविधान प्रत्येक नागरिक को देता है। प्रशासनिक सेवा में चयन हो जाने के बाद कोई व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं खो देता। सार्वजनिक जीवन में होने का अर्थ यह नहीं कि उसके निजी निर्णय सार्वजनिक निर्णय बन जाएँ।
एलबीएसएनएए की पहचान उसके प्रशिक्षण की गुणवत्ता, प्रशासनिक मूल्यों और राष्ट्रसेवा की भावना से बनती है। यहीं से वे अधिकारी निकलते हैं जो देश के दूरदराज़ क्षेत्रों में प्रशासन संभालते हैं, आपदाओं में राहत कार्यों का नेतृत्व करते हैं, कानून-व्यवस्था बनाए रखते हैं, विकास योजनाओं को लागू करते हैं और करोड़ों नागरिकों के जीवन को प्रभावित करने वाले निर्णय लेते हैं। यदि इस पूरे योगदान को नज़रअंदाज़ कर केवल कुछ विवाहों के आधार पर संस्थान का मूल्यांकन किया जाए, तो यह न केवल अनुचित बल्कि बौद्धिक रूप से भी कमजोर दृष्टिकोण होगा।
डिजिटल युग में सूचना जितनी तेज़ी से फैलती है, उतनी ही तेज़ी से भ्रम भी फैलता है। ऐसे समय में मीडिया और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। व्यंग्य लोकतंत्र का महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन जब व्यंग्य तथ्यों को विकृत करने लगे और किसी प्रतिष्ठित सार्वजनिक संस्थान की विश्वसनीयता को प्रभावित करे, तब उसकी सीमाओं पर विचार करना आवश्यक हो जाता है। आलोचना अवश्य होनी चाहिए, पर वह संस्थान की नीतियों, प्रशिक्षण पद्धति या प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर आधारित हो, न कि अधिकारियों के निजी जीवन पर।
समाज को भी यह स्वीकार करना होगा कि मित्रता और विवाह दोनों ही मानवीय संबंध हैं। यदि दो परिपक्व वयस्क, जो समान पेशे में हैं, आपसी सहमति और समझ से जीवनसाथी बनने का निर्णय लेते हैं, तो उसमें असामान्य कुछ भी नहीं है। किसी भी संस्थान की गरिमा इस बात से कम नहीं होती कि उसके कुछ छात्र या प्रशिक्षु विवाह कर लें। बल्कि कई बार समान मूल्यों, समान कार्यक्षेत्र और समान जीवन-दृष्टि वाले लोगों के बीच बनने वाले रिश्ते अधिक मजबूत सिद्ध होते हैं।
एलबीएसएनएए पर टिप्पणी करते समय हमें यह भी याद रखना चाहिए कि यह वही संस्थान है जिसने दशकों से देश को उत्कृष्ट प्रशासक दिए हैं। इन अधिकारियों ने प्राकृतिक आपदाओं, महामारी, कानून-व्यवस्था, चुनाव प्रबंधन, ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और शासन के अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया है। यदि उनकी प्रशिक्षण संस्था की पहचान कुछ व्यक्तिगत रिश्तों तक सीमित कर दी जाए, तो यह उन सभी अधिकारियों के समर्पण का भी अनादर होगा।
अंततः मूल प्रश्न यह नहीं है कि एलबीएसएनएए में कितने अधिकारियों ने अपने बैचमेट से विवाह किया। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हम आज भी स्त्री-पुरुष की सामान्य मित्रता को संदेह से देखते हैं? क्या हम किसी राष्ट्रीय संस्थान का मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर करेंगे या सोशल मीडिया की सनसनी के आधार पर? और क्या किसी व्यक्ति का निजी निर्णय पूरे संस्थान की पहचान बन सकता है?
उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी विवाह ब्यूरो नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माताओं की पाठशाला है। वहाँ बनने वाले व्यक्तिगत रिश्ते जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया हैं, संस्थान की पहचान नहीं। किसी भी महान संस्थान का मूल्यांकन उसके उद्देश्य, उसके मूल्यों, उसकी उपलब्धियों और समाज को दिए गए योगदान से होना चाहिए, न कि उसके परिसर में बने व्यक्तिगत संबंधों से। इसलिए समय की मांग यही है कि हम अफवाहों के बजाय तथ्यों, पूर्वाग्रहों के बजाय विवेक और सनसनी के बजाय संस्थागत गरिमा को महत्व दें। यही परिपक्व लोकतांत्रिक समाज की पहचान भी है।
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)


