Monday, February 16

पीड़िता की उम्र साबित करने को मार्कशीट पर्याप्त, ऑसिफिकेशन टेस्ट जरूरी नहीं: एमपी हाईकोर्ट

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि यदि पीड़िता की नाबालिग होने की स्थिति विश्वसनीय दस्तावेजी प्रमाणों से सिद्ध हो जाती है, तो उम्र निर्धारण के लिए ऑसिफिकेशन टेस्ट (हड्डी जांच) कराना अनिवार्य नहीं है। हाईकोर्ट ने 13 वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराए गए आरोपी की याचिका खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई 20 वर्ष की कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा।

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यह फैसला हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन ने सुनाया।

बचाव पक्ष ने उठाया था हड्डी जांच न होने का मुद्दा

मामले में बचाव पक्ष ने अदालत के समक्ष तर्क रखा कि डॉक्टर द्वारा पीड़िता की हड्डी की जांच कराने की सलाह दी गई थी, लेकिन पुलिस ने ऑसिफिकेशन टेस्ट नहीं कराया। बचाव पक्ष का कहना था कि इस वजह से अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर हो जाता है और उम्र को लेकर संदेह बना रहता है।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का दिया हवाला

हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि हर मामले में मेडिकल जांच कराना आवश्यक नहीं होता। यदि पीड़िता की उम्र से संबंधित स्कूल प्रमाणपत्र, मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट या नगर निगम/पंचायत द्वारा जारी जन्म प्रमाणपत्र उपलब्ध हों, तो वही उम्र सिद्ध करने के लिए पर्याप्त माने जाएंगे।

दस्तावेज और गवाहियों से साबित हुई उम्र

कोर्ट ने कहा कि मेडिकल जांच केवल तभी जरूरी होती है, जब उम्र साबित करने के लिए कोई दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध न हो। इस मामले में पीड़िता की उम्र उसके माता-पिता की गवाही, स्कूल के हेडमास्टर की गवाही तथा स्कूल के स्कॉलर रजिस्टर में दर्ज विवरण से स्पष्ट रूप से प्रमाणित हुई, जिसे अदालत ने भरोसेमंद माना।

घटना के समय नाबालिग थी पीड़िता

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष को सही ठहराते हुए कहा कि घटना के समय (जून 2019) पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम थी। अदालत के अनुसार लड़की की उम्र उस समय 12 वर्ष 11 माह 21 दिन थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आरोपी पर पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई पूरी तरह उचित थी।

हड्डी जांच न होने से केस पर नहीं पड़ा असर

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऑसिफिकेशन टेस्ट न होने से अभियोजन पक्ष के मामले पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा। हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी को दोषी ठहराने और सजा सुनाने में ट्रायल कोर्ट से कोई त्रुटि नहीं हुई है, इसलिए अपील को खारिज किया जाता है।

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