
माले / नई दिल्ली: हिंद महासागर की रणनीतिक स्थिति में एक नया विवाद उभर गया है। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने ऐलान किया है कि अब मालदीव चागोस द्वीपसमूह पर मॉरीशस की संप्रभुता को नहीं मानेगा। उन्होंने कहा कि यह इलाके उनके एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन (EEZ) में शामिल होंगे।
विवाद की पृष्ठभूमि
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1965 में ब्रिटेन ने मॉरीशस से चागोस द्वीपसमूह छीन लिया और डिएगो गार्सिया पर अमेरिका के साथ मिलकर सैन्य अड्डा बनाया।
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2023 में अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल ITLOS ने मॉरीशस के पक्ष में फैसला सुनाया।
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मालदीव ने इससे पहले चागोस पर दावा नहीं किया था, लेकिन अब राष्ट्रपति मुइज्जू ने पूर्व राष्ट्रपति सोलिह की नीति पलट दी।
मालदीव का कदम और सैन्य कार्रवाई
मालदीव के रक्षा मंत्रालय ने मालदीव नेशनल डिफेंस फोर्स (MNDF) को इस इलाके की निगरानी और सुरक्षा के लिए तैनात किया। MNDF ने विवादित क्षेत्र में ऑपरेशन शुरू किया, जिसमें गैर-कानूनी मछली पकड़ने में लगे जहाजों को रोका गया।
मुइज्जू की रणनीति
विशेषज्ञ मानते हैं कि मुइज्जू का कदम स्थानीय चुनावों और राष्ट्रवाद से प्रेरित है। इसके अलावा उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को चागोस पर डील के लिए संपर्क किया, लेकिन अमेरिका से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला। ब्रिटेन ने भी स्पष्ट कर दिया कि वह मॉरीशस के साथ ही है।
भारत पर असर
भारत हमेशा से हिंद महासागर में किसी विदेशी सैन्य बेस के खिलाफ रहा है और मॉरीशस के साथ चागोस के समझौते का हिस्सा रहा है। भारत मॉरीशस के अधीन डिएगो गार्सिया में अमेरिकी सैन्य सुविधाओं को स्वीकार करता है, ताकि चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला किया जा सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि मुइज्जू का दावा हिंद महासागर में भारत और अमेरिका के रणनीतिक हितों के लिए चुनौती खड़ा कर सकता है। यदि मालदीव किसी विदेशी सैन्य बेस की अनुमति देता है, तो यह क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
निष्कर्ष
मालदीव का कदम अंतरराष्ट्रीय नियमों और क्षेत्रीय समझौतों को चुनौती देता है। मुइज्जू की पहल ने हिंद महासागर में रणनीतिक जटिलताओं को बढ़ा दिया है, और भारत को अपने सुरक्षा और कूटनीतिक रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है।
