
ढाका: बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबैद इस्लाम ने हाल ही में SAARC के सेक्रेटरी जनरल मोहम्मद गुलाम सरवर से मुलाकात कर सार्क की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश दक्षिण एशिया में शांति, स्थिरता और खुशहाली के साझा विजन को प्राप्त करने के लिए सदस्य देशों के साथ मिलकर काम करने को तैयार है।
बांग्लादेशी मंत्री ने कहा कि “सार्क का विचार 1980 के दशक में स्वर्गीय राष्ट्रपति जियाउर रहमान ने क्षेत्रीय सहयोग और जीवन स्तर सुधार के लिए रखा था। दिसंबर 1985 में बांग्लादेश ने सार्क के पहले समिट का आयोजन किया और तब से संगठन की महत्ता बनाए रखने में सदस्य देशों का योगदान अहम रहा है।”
सार्क की मौजूदा स्थिति: भारत बाहर, पाकिस्तान-बांग्लादेश सक्रिय
वर्तमान में सार्क लगभग ‘कोमा’ में पड़ा है। भारत अब सार्क में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहा, जबकि पाकिस्तान और बांग्लादेश इसे सक्रिय करने की कोशिश में हैं। भारत ने 2016 के उरी हमले के बाद पाकिस्तान से आतंकवाद को लेकर बातचीत बंद कर दी थी और उस वर्ष के बाद से सार्क शिखर सम्मेलन में भाग नहीं लिया।
भारत का मानना है कि पाकिस्तान हर क्षेत्रीय विकास परियोजना, जैसे SAARC मोटर वाहन समझौता, में अड़ंगा डालता है। इसी वजह से भारत अब BIMSTEC पर फोकस कर रहा है, जिसमें पाकिस्तान शामिल नहीं है। यह भारत के नेबरहुड फर्स्ट और एक्ट ईस्ट विजन के लिए सुविधाजनक है।
पाकिस्तान-बांग्लादेश के इरादे
बांग्लादेश के लिए SAARC एक ऐसा मंच बन सकता है, जहां वह भारत पर अपनी निर्भरता कम कर सके। वहीं, पाकिस्तान इसे सक्रिय करके क्षेत्रीय स्तर पर अपनी प्रासंगिकता बढ़ाना चाहता है। इसके अलावा, पाकिस्तान ने SAARC में भारत की जगह चीन को शामिल करने की कोशिशें भी की हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के बाद, नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस ने भी सार्क को सक्रिय करने की कोशिशें शुरू की थीं। बांग्लादेश और पाकिस्तान के कई रणनीतिकार मानते हैं कि दक्षिण एशिया में भारत का दबदबा बहुत बढ़ गया है और SAARC को सक्रिय करके वे भारत को सामूहिक रूप से काउंटर करना चाहते हैं।
इस प्रकार, बांग्लादेश और पाकिस्तान के प्रयासों के बावजूद भारत पहले ही अपने वैकल्पिक मंचों पर फोकस कर चुका है, जिससे सार्क की पुनः सक्रियता पर भारत का प्रभाव न्यूनतम रह गया है।
