
कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर सियासी तापमान बढ़ गया है। भाजपा नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने बुधवार को तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पर तीखा हमला बोलते हुए बड़ा बयान दिया। उन्होंने दावा किया कि यदि आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा सत्ता में आती है, तो राज्यभर से मुगल शासकों से जुड़े नाम और निशान हटाए जाएंगे।
सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि ममता बनर्जी सरकार के कार्यकाल में बंगाल में बाबर जैसे “विदेशी हमलावरों” के नाम सार्वजनिक स्थानों पर बने रहेंगे, लेकिन भाजपा सरकार बनने पर ऐसा नहीं होने दिया जाएगा।
‘अप्रैल तक इंतजार कीजिए, फिर देखिए क्या होता है’
भाजपा नेता ने आक्रामक तेवर दिखाते हुए कहा कि आने वाले चुनावों में भाजपा सरकार बनाएगी और उसके बाद बंगाल में मुगल शासकों से जुड़े नामों को हटाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। उन्होंने कहा—
“अप्रैल तक इंतजार करें, जब हम सरकार बनाएंगे तो देखेंगे क्या होता है।”
बाबर को बताया विदेशी हमलावर
सुवेंदु अधिकारी ने बाबर को विदेशी हमलावर बताते हुए कहा कि बाबर, हुमायूं, अकबर, शाहजहां और औरंगजेब जैसे मुगल शासक भारत में अत्याचार और जबरन धर्म परिवर्तन के लिए जिम्मेदार रहे हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि मुगल शासन के दौरान मंदिरों को तोड़ा गया और महिलाओं के खिलाफ हिंसा हुई।
‘दार्जिलिंग से दीघा तक नाम हटाएंगे’
उन्होंने दावा किया कि बंगाल में जहां-जहां मुगल शासकों के नाम सार्वजनिक स्थलों पर दर्ज हैं, भाजपा सरकार बनने पर उन्हें समाप्त कर दिया जाएगा। सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि
“दार्जिलिंग से दीघा तक और कूच बिहार से काकद्वीप तक, जहां भी उनके नाम लिखे हैं, भाजपा सरकार उन्हें खत्म करेगी।”
बाबरी मस्जिद मुद्दे से बंगाल की राजनीति गरमाई
गौरतलब है कि बाबरी मस्जिद का मुद्दा बंगाल में अब बड़ा राजनीतिक विवाद बनता जा रहा है। इससे पहले टीएमसी के पूर्व नेता हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद जिले में ‘बाबरी मस्जिद’ बनाने की योजना का ऐलान किया था, जिसके बाद भारी विवाद खड़ा हो गया।
टीएमसी ने इस बयान के बाद हुमायूं कबीर को पार्टी से निलंबित कर दिया था। इसके बाद उन्होंने अपनी नई पार्टी जनता उन्नयन पार्टी (JUP) बनाने की घोषणा की।
राजनीतिक हलकों में बयान पर हलचल
सुवेंदु अधिकारी के बयान के बाद बंगाल की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। जहां भाजपा समर्थक इसे “इतिहास के पुनर्मूल्यांकन” से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं टीएमसी और विपक्ष इसे ध्रुवीकरण की राजनीति करार दे रहे हैं।
