
पटना।
देश में नया सियासी विवाद यूजीसी रेगुलेशन 2026 को लेकर गरमाया हुआ है। आरजेडी की फायरब्रांड प्रवक्ता सारिका पासवान ने भाजपा पर तीखा हमला करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट की रोक ने साबित कर दिया कि यह बिल केवल चुनावी जुमला था और पिछड़ों और दलितों को बेवकूफ बनाने की कोशिश की गई।
सारिका ने आरोप लगाया कि देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था आज भी उन्हीं 10% प्रभावशाली लोगों के कब्जे में है, जिनके आगे मोदी सरकार नतमस्तक है। उनका कहना था कि यूजीसी के नए संशोधन को रोककर अंततः वही वर्चस्वशाली वर्ग अपनी जीत सुनिश्चित कर गया।
झूठा हाय-तौबा, चुनावी एजेंडा
सारिका पासवान ने कहा, “पहले दिन से मुझे पता था कि ये बिल दलित और पिछड़ों के हितों के लिए नहीं, बल्कि चुनावी माहौल बनाने के लिए लाया गया। बंगाल और यूपी चुनावों में यह रणनीति इस्तेमाल की जा रही है। भाजपा ने झूठे हाय-तौबा और बहकावे के माध्यम से पिछड़ों को ठगने की कोशिश की।”
उनका कहना था कि देश की 90% आबादी दलित और पिछड़ा वर्ग है, लेकिन भाजपा इस बिल के जरिए केवल 10% प्रभावशाली वर्ग की इच्छाओं को साध रही है। इस बिल का उद्देश्य आम जनता को यह दिखाना था कि सरकार उनके हितों की रक्षा कर रही है, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है।
सांसदों और विधायकों पर भी निशाना
सारिका ने अपने ही समुदाय के नेताओं पर भी निशाना साधा। उनका कहना था कि पिछड़े और दलित समाज के सांसद और विधायक केवल आरक्षण की मलाई खाते हैं, लेकिन जब अपनी आवाज उठाने की बारी आती है, तो चुप रहते हैं। उनका आरोप था कि समाज के कई युवा UPSC जैसी प्रतियोगिताओं में बेहतरीन अंक लाकर भी इंटरव्यू में असफल कर दिए जाते हैं, क्योंकि पैनल में एक विशेष वर्ग का वर्चस्व होता है।
शिक्षा और मेस तक पर वर्चस्व
सारिका पासवान ने कहा कि आईआईटी और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों में दलित और पिछड़ों को मेस या प्रशासन में आगे बढ़ने नहीं दिया जाता। यह भेदभाव सदियों पुराना है, जिसे शिक्षा और प्रशासन में जारी रखा गया। उन्होंने संकल्प जताया कि इस भेदभाव के खिलाफ उनकी लड़ाई मजबूती से और लंबी अवधि तक जारी रहेगी।
सारिका का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की रोक ने यह स्पष्ट कर दिया कि बीजेपी का पिछड़ों और दलितों के हितों का ढोंग अब जनता के सामने आया है, और अब इस मुद्दे पर सियासी लड़ाई तेज होगी।