
अहिंसा के पुजारी और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि हर वर्ष 30 जनवरी को मनाई जाती है। 30 जनवरी 1948 को एक प्रार्थना सभा के दौरान गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई थी। लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज कुछ घटनाएं और उनके अंतिम दिनों के वक्तव्य यह संकेत देते हैं कि गांधीजी को अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो चुका था।
स्वतंत्रता के बाद फैली हिंसा से बेहद व्यथित थे गांधीजी
भारत की आज़ादी के बाद हुए देश-विभाजन और उससे उपजी सांप्रदायिक हिंसा ने गांधीजी को भीतर तक झकझोर दिया था। हिंदू, मुस्लिम और सिख समुदायों के बीच फैली नफरत और लाखों लोगों के विस्थापन से वे अत्यंत दुखी थे।
इतिहासकारों के अनुसार, गांधीजी चाहते थे कि आज़ादी के साथ भारत सद्भाव, सहअस्तित्व और मानवता की मिसाल बने, लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट थी।
शांति के लिए आमरण अनशन और नोआखली यात्रा
सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए गांधीजी ने नोआखली की यात्रा की और वहां शांति स्थापित करने के उद्देश्य से आमरण अनशन किया। यह उनका आजमाया हुआ तरीका था, जिससे हिंसा फैलाने वालों की अंतरात्मा को झकझोरा जा सके।
उनके इस प्रयास को पाकिस्तान सहित दुनिया के कई हिस्सों से समर्थन मिला। तत्कालीन पाकिस्तानी नेतृत्व ने भी शांति के प्रति उनकी चिंता की सराहना की।
‘गांधी को मरने दो’ जैसे नारे और बढ़ता विरोध
हालांकि, उस समय दिल्ली में एक वर्ग ऐसा भी था, जो गांधीजी के अहिंसा और क्षमा के सिद्धांतों से असहमत था। बिरला हाउस के आसपास ‘गांधी को मरने दो’ जैसे भयावह नारे भी सुनाई देने लगे थे। यह वातावरण गांधीजी की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा था।
‘मेरे लिए मृत्यु एक गौरवशाली मुक्ति होगी’
13 जनवरी 1948 को अपने अंतिम उपवास की शुरुआत करते हुए गांधीजी ने कहा था—
“मेरे लिए मृत्यु एक गौरवशाली मुक्ति होगी, बजाय इसके कि मैं भारत और उसके धर्मों के विनाश का असहाय साक्षी बना रहूं।”
उन्होंने दोहराया कि उनका सपना एक ऐसा भारत था, जहां सभी धर्मों के लोग शांति और सम्मान के साथ रहें।
बम विस्फोट के बाद कही थी यह मार्मिक बात
20 जनवरी 1948 को गांधीजी की प्रार्थना सभा के पास एक बम विस्फोट हुआ, हालांकि उसमें वे बाल-बाल बच गए। इसी घटना के बाद उन्होंने वह ऐतिहासिक वाक्य कहा—
“अगर मुझे किसी पागल की गोली से मरना ही है, तो मुझे मुस्कुराते हुए मरना चाहिए। मेरे भीतर कोई क्रोध नहीं होना चाहिए। ईश्वर मेरे हृदय में और मेरे होठों पर होना चाहिए।”
यह कथन आज भी लोगों को भावुक कर देता है और उनकी आध्यात्मिक दृढ़ता को दर्शाता है।
30 जनवरी 1948: वह काला दिन
30 जनवरी 1948 को शाम लगभग पांच बजे, 78 वर्षीय गांधीजी प्रार्थना सभा के लिए जा रहे थे। उपवास के कारण वे कमजोर थे और अपनी पोतियों के सहारे चल रहे थे। उसी समय नाथूराम गोडसे भीड़ से निकला, प्रणाम किया और उनके सीने व पेट में तीन गोलियां दाग दीं।
कुछ प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, गांधीजी के होंठों से अंतिम शब्द ‘राम, राम’ निकले।
आधे घंटे में बुझ गया राष्ट्र का दीपक
घटना के बाद अफरा-तफरी मच गई। गांधीजी को अस्पताल नहीं ले जाया जा सका और आधे घंटे के भीतर उनका निधन हो गया।
देश शोक में डूब गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने रेडियो पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा—
“राष्ट्रपिता अब हमारे बीच नहीं रहे। हमारे जीवन से प्रकाश चला गया है।”
अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब
अगले दिन गांधीजी की अंतिम यात्रा में करीब 10 लाख लोग शामिल हुए। यमुना तट तक पांच मील लंबा जनसैलाब उमड़ पड़ा। सेना के वाहन पर तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर ले जाया गया और वायुसेना के विमानों ने पुष्पवर्षा की।
चंदन की चिता पर उनका अंतिम संस्कार किया गया और अस्थियों का विसर्जन बाद में संगम पर किया गया।