
उज्जैन: मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मंदिर में गर्भगृह में आम श्रद्धालुओं के प्रवेश पर लगभग डेढ़ साल से लागू पाबंदी अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गई है। मंदिर में वीआईपी कल्चर और विशेष व्यक्तियों को गर्भगृह में प्रवेश देने की व्यवस्था को चुनौती देते हुए याचिका मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनी जाएगी।
इंदौर निवासी एडवोकेट चर्चित शास्त्री ने वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन के माध्यम से यह याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि जब मंदिर प्रशासन प्रभावशाली व्यक्तियों को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति दे रहा है, तो आम श्रद्धालुओं को इससे वंचित रखना समानता के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के खिलाफ है। याचिका में सभी श्रद्धालुओं के लिए एक समान प्रवेश व्यवस्था लागू करने की मांग की गई है।
पाबंदी की पृष्ठभूमि
4 जुलाई 2023 को श्रावण मास के दौरान भीड़ नियंत्रण को देखते हुए मंदिर प्रबंधन समिति ने आम भक्तों के प्रवेश पर अस्थायी रोक लगा दी थी। तब यह कहा गया था कि सावन समाप्त होने के बाद व्यवस्था पुनः शुरू की जाएगी। लेकिन डेढ़ साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद अब तक गर्भगृह आम भक्तों के लिए बंद है। वर्तमान में श्रद्धालुओं को गणेश मंडपम, कार्तिकेय मंडपम और नंदी हॉल से ही दर्शन करने पड़ रहे हैं।
मंदिर प्रशासन का तर्क है कि महाकाल लोक परियोजना के लोकार्पण के बाद भक्तों की संख्या प्रतिदिन 1.5 से 2 लाख तक पहुँच गई है, इसलिए सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के कारण गर्भगृह में प्रवेश सीमित रखा गया। लेकिन वीआईपी और जनप्रतिनिधियों को बिना रोक-टोक प्रवेश दिया जा रहा है, जिससे भेदभाव का आरोप लगा है।
जनप्रतिनिधियों ने भी उठाया मुद्दा
उज्जैन के सांसद अनिल फिरोजिया और महापौर ने भी आम भक्तों को गर्भगृह से दर्शन दिलाने की मांग की थी। हाई कोर्ट में राहत न मिलने पर मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है, जहां मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉय माल्या बागची की डबल बेंच मंगलवार को सुनवाई करेगी।
विशेषज्ञों और भक्तों की उम्मीद: श्रद्धालु उम्मीद कर रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट आम भक्तों के हित में निर्णय देगा और सभी को अपने आराध्य बाबा महाकाल के दर्शन और जल अर्पण का समान अवसर मिलेगा।