
नई दिल्ली: नए भ्रष्टाचार विरोधी बिल को लेकर कानूनी विशेषज्ञों और दो प्रमुख लॉ विश्वविद्यालयों ने गंभीर आशंका जताई है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री को गंभीर आपराधिक आरोपों में केवल 30 दिन की गिरफ्तारी के बाद पद से हटाना राजनीतिक बदले की कार्रवाई का जरिया बन सकता है।
विशेषज्ञों ने उजागर की कमियां
विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (NLU) ओडिशा और नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिडिकल साइंसेज (NUJS), कोलकाता के प्रतिनिधियों ने संसदीय समिति के समक्ष यह कहा कि बिल में कई खामियां हैं।
बिल जनता की इच्छा के खिलाफ भी जा सकता है।
पद से हटाने के लिए ‘आरोप तय होने’ का आधार होना चाहिए, जिससे न्यायिक प्रक्रिया जुड़ सके।
वर्तमान कानून के तहत गंभीर अपराध में पुलिस आरोपी को 90 दिनों तक हिरासत में रख सकती है, जबकि बिल में 30 दिन की सीमा रखी गई है।
NUJS का कहना है कि बिल भले ही राजनीति में अपराध रोकने के उद्देश्य से लाया गया है, लेकिन इससे केंद्र और राज्य सरकारों को अस्थिर करने की संभावना बढ़ सकती है। NLU ने इसे संभावित ‘सत्ता परिवर्तन अभियान’ करार दिया और कहा कि यह बदले की कार्रवाई को बढ़ावा देता है।
राजनीतिक दुरुपयोग की आशंका
विधि सेंटर के अनुसार गिरफ्तारियां समय और चुनावी राजनीति के आधार पर की जा सकती हैं।
NLU का मानना है कि विपक्षी दल इस प्रावधान का उपयोग वैध सरकारों को अस्थिर करने के लिए कर सकते हैं।
बिल में ऐसे अपराधों के लिए पद से हटाने का प्रावधान है जिनमें पांच साल या उससे अधिक की सजा है, लेकिन भ्रष्टाचार जैसे कई गंभीर अपराध पांच साल से कम सजा वाले भी हैं।
सरकार का रुख
सरकार इस बिल का समर्थन कर रही है और ऐसे उदाहरण देती है जहां मंत्री या मुख्यमंत्री (जैसे दिल्ली के अरविंद केजरीवाल) भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद लंबे समय तक पद पर बने रहे। हालांकि, सरकार ने बिल को संसदीय पैनल में आगे चर्चा के लिए भेजने पर सहमति जताई है। इस पैनल की अध्यक्षता भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी कर रही हैं। ज्यादातर विपक्षी दलों ने इसमें भाग लेने से इनकार किया है।