Saturday, May 30

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सोनू निगम का ‘सूफी फूफी’ बयान, सोशल मीडिया पर मचा विवाद: क्या उन्होंने खुसरो और बुल्ले शाह को भुला दिया?

 

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बॉलीवुड के चर्चित गायक सोनू निगम का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वे सूफी संगीत को लेकर विवादित टिप्पणी करते नजर आए। वीडियो में सोनू कहते हैं कि सूफी कोई संगीत नहीं बल्कि केवल एक विचार है। उनका कहना है कि “सूफी-फूफी” शैली 2000 के बाद ही सामने आई और पहले ऐसा कुछ मौजूद नहीं था।

 

सोनू निगम के इस बयान ने इंटरनेट पर हलचल मचा दी है। खास बात यह है कि उनके इस आधे-अधूरे क्लिप को शेयर करते हुए कई यूजर्स बिना इतिहास जाने ही अपनी राय दे रहे हैं। उन्हें यदि सूफी संगीत के इतिहास की जानकारी होती, तो शायद ऐसा नहीं करते।

 

सूफी संगीत: सदियों पुराना इतिहास

 

सूफी संगीत का इतिहास बहुत पुराना है और इसकी शुरुआत सूफी संतों ने की थी। सूफियों ने ‘समा’ जैसी आध्यात्मिक प्रथाओं के माध्यम से ईश्वर से मिलन का प्रयास किया। यह संगीत वैसा ही है जैसे हम भक्ति गीतों और भजनों में पाते हैं।

 

सूफी संगीत फारसी परंपरा से विकसित होकर दिल्ली सल्तनत (13वीं सदी) के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में फला-फूला। इस दौर में अमीर खुसरो ने कव्वाली का प्रारूप तैयार किया। बाद में नुसरत फतेह अली खान और आबिदा परवीन जैसे कलाकारों ने इसे वैश्विक पहचान दिलाई।

 

प्रमुख कलाकार और आधुनिक प्रभाव

 

सूफी संगीत में रूमी, हाफिज, बुल्ले शाह, अमीर खुसरो जैसी महान सूफी कवियों की रचनाओं को धुनों में पिरोया जाता है। इसके लोकप्रिय रूपों में कव्वाली सबसे जाना-माना है।

 

साल 1990 के दशक में सूफी रॉक और फ्यूजन शैली उभरी, जिसमें पारंपरिक सूफी संगीत को रॉक और अन्य आधुनिक शैली के साथ मिलाया गया। बॉलीवुड में भी यह संगीत लोकप्रिय हुआ, जैसे फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ से लेकर 2000 के बाद की फिल्मों में दिखाई देता है।

 

एआर रहमान ने भी अपनी कई रचनाओं में सूफी शैली को अपनाया, जैसे ‘पिया हाजी अली’, ‘ख्वाजा मेरे ख्वाजा’, ‘कुन फया कुन’। इसके अलावा, मैडोना, लोरीना मैककेनीट, टोरी एमोस जैसे अंतरराष्ट्रीय कलाकारों ने भी अपने संगीत में सूफी तत्वों का इस्तेमाल किया।

 

निष्कर्ष

 

सोनू निगम का यह बयान सूफी संगीत के इतिहास को सही ढंग से नहीं दर्शाता। सूफी संगीत केवल विचार नहीं, बल्कि एक गहन और सदियों पुरानी संगीतीय परंपरा है, जिसने न केवल भारतीय उपमहाद्वीप, बल्कि पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाई है।

 

इसलिए अगली बार जब ऐसा कोई विवादित दावा सामने आए, तो इतिहास और तथ्यों की जानकारी के साथ ही सही प्रतिक्रिया दी जा सकती है।

 

 

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