
पटना/मुंबई: मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) के चुनावों ने शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे को भाषा आधारित नफरत की राजनीति पर कड़ा सबक सिखा दिया है।
तीन दिन पहले राज ठाकरे ने चुनावी भाषण में हिंदी भाषी समुदाय को लक्षित करते हुए कहा था, “हिंदी आपकी भाषा है। इसे थोपने की कोशिश करेंगे, तो मैं आपको लात मारूंगा।” हालांकि, इस नफरती राजनीति का नतीजा मनसे को सिर्फ 6 वार्डों में जीत और 2.87 प्रतिशत वोटों के रूप में मिला। शिवसेना (यूबीटी) को भी भारी नुकसान हुआ।
मुंबई में उत्तर भारतीयों का प्रभाव
मुंबई में बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि के मूल निवासी बड़ी संख्या में बसे हैं। कांदिवली, मलाड, मीरा-भयंदर, कुर्ला, गोरेगांव और घाटकोपर जैसे इलाकों में उत्तर भारतीय मतदाताओं का झुकाव बीजेपी और कांग्रेस की ओर रहा। यह झुकाव ठाकरे भाइयों की नफरती राजनीति का सीधा परिणाम था।
मराठी अस्मिता के नाम पर हिंदी विरोध
बीएमसी चुनाव से पहले ठाकरे भाइयों ने मराठी अस्मिता के नाम पर हिंदी भाषियों के खिलाफ संदेश फैलाया। राज ठाकरे ने कहा था कि अगर मराठी लोग एकजुट नहीं हुए तो उनका अस्तित्व खतरे में है। उद्धव ठाकरे ने बीजेपी पर नकली हिंदुत्व और विभाजनकारी राजनीति का आरोप लगाया।
भाषा से आगे, खानपान तक निशाना
ठाकरे भाइयों की आलोचना केवल भाषा तक सीमित नहीं रही। शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र ‘सामना’ ने उत्तर भारतीयों के खानपान को लेकर भी निशाना साधा। संपादकीय में वड़ा-पाव को मराठी पहचान और रोज़ी-रोटी का प्रतीक बताया गया, जबकि बिहार का ‘लिट्टी-चोखा’, दिल्ली की ‘कचौरी’ या कर्नाटक का ‘बेन्ने डोसा’ जैसी स्थानीय डिशेज को कमतर दिखाया गया।
भाषाई ध्रुवीकरण का दांव फेल
बीएमसी की कुल 227 सीटों में से बीजेपी 89, शिवसेना (यूबीटी) 65, शिवसेना 29, कांग्रेस 24, मनसे 6 और एनसीपी 3 सीटें जीत सकी। ठाकरे बंधुओं का ध्रुवीकरण का दांव फेल हो गया। मराठी भाषी मतदाताओं ने साफ संदेश दे दिया कि मुंबई न तो किसी भाषा विशेष का शहर है, न ही भाषा आधारित राजनीति की जागीर।
मुंबई ही नहीं, पूरा महाराष्ट्र नकार चुका है ठाकरे बंधुओं को
राज ठाकरे की पार्टी 2014 और 2019 के विधानसभा चुनावों में भी बड़े पैमाने पर असफल रही और 2024 में उनका खाता भी नहीं खुला। बीएमसी चुनाव में मिली हार इस प्रवृत्ति को और पुष्ट करती है।